हिंदी साहित्य का इतिहास कक्षा 12 आधुनिक काल
आधुनिक काल प्रारंभ समानता आधुनिक काल का प्रारंभ सन 1843 से माना गया है परंतु किसी भी नवीन युग की प्रवृत्तियों को जन्म अकस्मात 1 दिन में नहीं हो जाता युग परिवर्तन की एक निश्चित तिथि का उल्लेख करना या उसकी स्थिति स्पष्ट विभाजन रेखा किस देना बहुत ही कठिन है आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी आधुनिक काल का प्रारंभ तंबाकता उन्नीस सौ से माना है परंतु हिंदी में नवीन विचारधाराओं का आगमन या आधुनिक कालीन प्रवृत्तियों का बीजारोपण इसके 40 50 वर्ष पहले ही हो चुका था शिक्षा प्रसार और भाषा संबंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए सन 18 सो में ही फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हो चुकी थी खड़ी बोली के विकास की नींव किस कॉलेज की स्थापना के साथ ही पड़ी इस प्रकार आधुनिक काल का पूर्ववर्ती काल तभी से प्रारंभ हुए माना जाना चाहिए महत्व हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का बहुत ही अधिक महत्व है हिंदी का विविध मुखी विकास इसी काल में हुआ खड़ी बोली में गद्य का विकास इसी युग की महानतम देन है उपन्यास कहानी नाटक निबंध आलोचना इतिहास आदि साहित्य के विभिन्न अंगों का विकास तथा परिष्कार भी इसी युग में हुआ उपलब्धियों के आधार पर हम इसे हिंदी का स्वर्ण युग कह सकते हैं आधुनिक काल का विभाजन अंग्रेजी शिक्षा और सभ्यता के पारंपरिक हमारी विचारधारा में परिवर्तन हुआ इस परिवर्तन के कारण हमारा साहित्य आधुनिक हिंदी साहित्य के नाम से पुकारा जाने लगा 1850 इसे हिंदी साहित्य की विचारधारा में जो आधुनिकता आई भारतेंदु युग का पृष्ठभूमि का निर्माण करती है स्वयं भारतेन्दु और उनके युग के साहित्यकारों की रचनाओं में न नवीन युग की के चेतना स्पष्ट रूप से प्रस्फुटित हुई इसलिए आधुनिक काल का वास्तविक पादु भाव भारतीय हिंदू हिंदू हरिश्चंद्र से होता है सन 18 सो 50 से 19 सौ का समय भारतेंदु युग के नाम से प्रसिद्ध है भारतेंदु ने हिंदी साहित्य धारा को रितिकालीन दूरियों से हटाकर राष्ट्रीयता और समाज सुधार की दिशा में आगे बढ़ाया ललित साहित्य रचना की दृष्टि से हमें आधुनिकता के दर्शन प्रथम भारतीय हिंदू युग में ही होते हैं इसी काल को हिंदी साहित्य का प्रथम उत्थान काल कहा जाता है भारतेंदु के बाद आधुनिक हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग का प्रारंभ होता है हिंदी साहित्य का अद्वितीय उत्थान काल कहा जाता है सन 1903 से प्रथम विश्व युद्ध सन 1914 से 1918 तक का समय द्विवेदी युग कहा जाता है इस काल का साहित्यिक नैतिक दृष्टिकोण से विशेष रूप से प्रभावित है भाषा संस्कार की ओर इस युग में बहुत ध्यान दिया गया द्विवेदी युग के पश्चात प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति होते-होते परिस्थिति विशेष के कारण छायावादी युग 1918 से 1936 तक आता ह है चेन्नई से 36 के आसपास आधुनिक हिंदी साहित्य मार्क्सवादी विचारधारा की प्रवृत्तियों से प्रभावित हुआ मानव समानता की आवाज बुलंद हुई और आधुनिक काल में प्रगतिवाद का आगमन हुआ पंत जैसे कलाकार भी इससे प्रभावित हुए सन 1936 से 1945 तक के द्वितीय महा विश्वयुद्ध की परिस्थितियों से प्रभावित होने के कारण हिंदी में प्रयोगवाद का जन्म हुआ कुछ विद्वान आधुनिक काल का विभाजन पूर्व छायावादी युग छायावादी युग और उत्तर छायावाद युग के नामों से करते हैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिक काल में गद्य की प्रधानता का ध्यान रखकर पूरे काल को गद्य काल कहां है। उन्होंने इस काल को
प्रथम उत्थान संवत 1925 से 50
द्वितीय उत्थान संवत 1950 से 75
और तृतीय उत्थान संवत 1946 से अब तक
नाम से तीन भागों में विभाजित किया है।
हम अध्ययन की सुविधा के लिए आधुनिक काल को चार भागों में विभक्त करना उचित समझते हैं
प्रथम उत्थान- भारतेंदु युग 1850-1900
द्वितीय उत्थान- द्विवेदी युग 1900 से 1918 तक
तृतीय उत्थान- छायावादी युग अथवा नव यौवन काल सन 1918 से 1936 तक
चतुर्थ उत्थान- उत्तर छायावाद युग या वर्तमान युग सन 1936 से अब तक
आधुनिक काल के साहित्य की विशेषताएं----
विशेषताएं
गद्य का विकास-- इशू की सबसे बड़ी विशेषता गध का बहुमुखी विकास है इस युग के पूर्व विशेषता मुद्रण यंत्र के अभाव में केवल कविता का ही विकास हो पाया था पद साहित्य का पर्यायवाची बना रहता था था गध के विकास और उन्नति के कारण अनेक आलोचक इस युग को गद्य काल के नाम से पुकारते हैं वस्तुत आ गए अपने विविध रूपों नाटक निबंध, कहानी ,उपन्यास, समालोचना, जीवन चरित्र आदि के साथ ही युग को गौरवान्वित कर रहा है।
खड़ी बोली की प्रधानता- खड़ी बोली की प्रधानता हिंदी पद और ग दोनों के लिए स्वीकार की गई नवयुग की चेतना की अभिव्यक्ति के लिए खड़ी बोली ही उपयुक्त भाषा मानी गई थी खड़ी बोली बढ़ते बढ़ते राष्ट्रभाषा के उच्च पद पर आसीन होने योग्य हुई अंग्रेजी उर्दू और देश की विभिन्न पारदेसी भाषाओं के शब्दों को अपनाकर यह समृद्ध शालिनी इसका संदेश के प्रादेशिक भाषाओं से निरंतर बढ़ता जा रहा है जो राष्ट्रीय एकता के लिए वांछनिय है।
राष्ट्रीय भावना की वृद्धि-- आधुनिक हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय भावना की वृद्धि की तीसरी महान विशेषता है देश में राजनीतिक चेतना धीरे-धीरे बड़ी इसके रूप विनाश स्थानों पर परिवर्तित होते रहे भारत के अतीत गौरव का गान किया गया और इसके वर्तमान पर खूब और असंतोष की भावनाएं व्यक्त की गई द्वितीय स्थान में राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ कांग्रेस के कार्यक्रम बड़े जनसाधारण के प्रति सहानुभूति बड़ी दू हिंदू मुस्लिम एकता के लिए पर्यत्न हुए तृतीय उत्थान काल में गांधी जी के नेतृत्व में देश ने साहित्य हिंसा पर बल दिया बलिदान की भावना चतुर्दिक बड़ी राष्ट्रप्रेम का संदेश देशभर में भली-भांति गूंज उठा चतुर्थ स्थान में राष्ट्रप्रेम की भावना और अधिक प्रबल हुई किसान श्रमिक और हरिजन सभी राष्ट्रप्रेम के महत्व को समझ कर देश के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने को प्रस्तुत हो गए और देश स्वतंत्र हुआ राष्ट्रप्रेम के विकास के उपर्युक्त रूपों का उल्लेख हमारे आधुनिक साहित्य में उपलब्ध है मैथिलीशरण गुप्त रामनरेश त्रिपाठी सुभद्रा कुमारी चौहान माखनलाल चतुर्वेदी रामधारी सिंह दिनकर बालकृष्ण शर्मा नवीन सोहनलाल द्विवेदी आदि ने राष्ट्रप्रेम के ललित गाने
साधारण जन जीवन का साहित्य के वीरगाथा काल में राजाओं और सामान तू से संबंधित काव्य रचना हुई
कवि के व्यक्तित्व की प्रधानता
प्रकृति का सुंदर वर्णन
श्रृंगार की भावना का विकास
वादों की प्रधानता
साहित्य पर अंग्रेजी का प्रभाव
मनोविज्ञान का समावेश
मार्क्सवाद का प्रभाव
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