सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जीवन परिचय दीजिए।

उतर:-   सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्म 1898 ईस्वी में बंगाल के महासागर राज्य में हुआ था। इनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के निवासी थे। संस्कृत ,बांग्ला ,अंग्रेजी का अध्ययन इन्होंने घर में ही किया था। निराला बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। कविता के अतिरिक्त उपन्यास ,कहानी ,निबंध, आलोचना और संस्मरण भी लिखे। उनकी रचनाएं परिमल गीतिका अनामिका तुलसीदास ,नए पत्ते ,आराधना आदि है यह हिंदी साहित्य की क्रांतिकारी क्रांतिकारी कवि माने जाते हैं 1961 में इनका देहांत हो गया।

२)    संध्या सुंदरी पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए अथवा संध्या सुंदरी कविता का मूल मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए ।

उतर:-संध्या सुंदरी निराला की एक प्रसिद्ध कविता है जिसकी रचना 1921 ईस्वी में हुई थी ।इस कविता का प्रकाशन "अपरा" नामक काव्य संग्रह में हुआ था। इस कविता में संध्या बेला का रुपात्मक चित्रण किया गया है। एक कविता अर्ध र्निशा में लखनऊ के एक होटल में लिखी गई है।

      दिन अपनी समाप्ति की ओर है संध्या रूपी सुंदरी किसी परी की भांति धीरे-धीरे आकाश से नीचे उतर रही है ।संध्या की उसे बेला में असीम गंभीरता दिखाई पड़ती है। दूर-दूर तक हास विलास का कोई चिन्ह तक नजर नहीं आता है ,अगर कुछ नजर आता है तो वह एक तारा जो हंसता हुआ दिखाई पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे कि मानो संध्या रूपी सुंदरी की घूघंराले काले बालों में गुथां हुआ है ।उसका  श्रृंगार   करता  प्रतीत हो रहा   है । 

संध्या के उस समय में आल्सय और कोमलता का अद्भुत संगम दिखाई पड़ता है। संध्या रूपी सुंदरी निर्माता रूपी सखी के कंधों पर बाहें डाल एक छाया के समान आकाश मार्ग से चली आ रही है ना तो उसके हाथों में कोई वीणाहै ना ही उसके पैरों में कोई रुनझुन की आवाज है पूरे के पूरे वातावरण में सिर्फ और सिर्फ अपनी निस्थबध्ता की ही गुंजायमान है।

आकाश में, संसार में ,शांत सरोवर में ,स्थित कमलनी दल में, नदी के विस्तार में, पर्वत के शिखर पर ,समुद्र की लहरों में, धरती ,जल ,आकाश ,वायु और अग्नि में सर्वत्र असीम शांति व्याप्त हो रही है और सन्नाटे का स्वर गूंज रहा है।

 संध्या- सुंदरी आकाश से धरती पर मदिरा की नदी सी बहते हुए आती है। दिन भर के थके हुए प्राणियों को वह प्रेम पूर्वक आलस्य  रूपी मदिरा का पान करती है ,वह उन्हें अपने गोद में सुलाती है और उन्हें मधुर सपने दिखाती है। आधी रात के पूर्ण शांति काल में संध्या सुंदरी विलीन  हो जाती है। ऐसे समय में कवि के हृदय में प्रेम भाव जागृत होता है ।उसके कंठ में स्वतः ही विराग राग  फूट पड़ता है।

3) संध्या सुंदरी कविता के भाव सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।

उतर:- निराला जी की संध्या सुंदरी कविता छायावादी युग की श्रेष्ठ रचना मानी जाती है एक कविता प्रकृति काव्य का श्रेष्ठ उदाहरण भी है प्रकृति का सुंदर चित्रण करने के साथ-साथ निराला जी ने इसमें रहस्य अनुमति भी प्रकट की है इस कविता की भाव पक्ष एवं कला पक्षी विशेषता इस प्रकार है :-

भाव पक्ष :-   

सौंदर्य का व्यापक चित्रण:- संध्या सुंदरी कविता निराला के सौंदर्य चित्रण की प्रतिभा का परिचायक है इस कविता में संध्या का वर्णन सुंदरी के रूप में किया गया है जो पड़ी के समाधि में गति से आसमान से धरती पर उतर रही है।

  दिवसावसान का समय

 मेघ में आसमान से उतर रही है

 वह संध्या सुंदरी परी -सी 

धीरे-धीरे धीरे-धीरे।

प्रकृति का मानवीयकरण :- निराला ने संध्या को सुंदरी मानकर उसे पर मानवीय क्रियाओ का आरोप किया है। संध्या- सुंदरी अपनी सखी के कंधे पर अपनी बाहे़ डाले हुए धीरे-धीरे आकाश मार्ग से चली आ रही है। इस चित्र को कवि ने इस प्रकार चित्रित किया है :-

"अलसता  कि -सी लता

 किंतु कोमलता कि वह काली

 सखी निरवता के कंधे पर डाले बा़ंह 

छांह सी अंबर पथ से चली।"

रहसात्मक झलक:- रहस्यवाद छायावादी कवियों के प्रमुख विशेषता है संध्या सुंदरी नामक कविता में हमें स्वस्थ प्राकृतिक रूप में साथ-साथ रहस्यमई शक्ति के भी अनुपम झलक दिखाई पड़ती है ।

"सिर्फ एक अव्यक्त शब्द सा चुप, चुप,चुप

 है गूंज रहा सब कहीं।"

कला पक्ष:- काव्य शिल्प की दृष्टि से संध्या सुंदरी उत्कृष्ट रचना है ।इसमें कवि ने मौन गंभीर वातावरण को अत्यंत सूक्ष्म रेखाओं और संकेत के माध्यम से स्पष्ट किया है।

' संध्या सुंदरी' कविता शब्द विधान की दृष्टि से अनुपम है ।इसके किसी भी शब्द को अनावश्यक मानकर हटाया नहीं जा सकता ।कविता की भाषा भाव अनुकूल है ।निराला जी की प्रमुख विशेषता मुक्त छंद का यह सुंदर उदाहरण है। उत्प्रेक्षा, रूपक, मानवीयकरण ,उपमा आदि अलंकार पुरी कलात्मक के साथ कविता में प्रयुक्त किए गए हैं ।

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