प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में उत्तर भारत में पूर्व राज्य से राज्य की ओर संक्रमण

 प्रश्न 1:-प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में उत्तर भारत में पूर्व राज्य से राज्य की ओर संक्रमण की व्याख्या कीजिए।

 उत्तर :-राज्यों की उत्पत्ति के संबंध में कोई समान्कयीरण करना अत्यंत ही कठिन है क्योंकि यह परिवर्तन की एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम है ,लेकिन तब भी समस्या को संबोधित करना इस कारण जरूरी है क्योंकि एक संस्था के रूप में हमेशा से राज्य का अस्तित्व नहीं था। इस विषय पर विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना होगा की मुख्य समस्याएं क्या है? राज्य शब्द की परिभाषा हम प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राज्य से संबंधित अन्य संस्थाओं के विषय में जानकारी प्राप्त करके आरंभ कर सकते हैं या फिर हमें देख सकते हैं कि वे संघटक तत्व एक साथ कब और कैसे आए जिनसे राज्यों का उदय हुआ था ।'अर्थशास्त्र' में वर्णित राज्य के सप्तांग सिद्धांत को एक सुविधा पूर्ण संदर्भ बिंदु माना जा सकता है तथा उसी के सहारे यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि किस प्रकार राजस्व का जन्म हुआ तथा वर्ण विभाजित समाज की रूपरेखा किस प्रकार तैयार हुई ।भूमि निजी संपत्ति के रूप में किस प्रकार उभरकर सामने आई ,किसी भू-सीमांकित क्षेत्र से जुड़े होने की भावना कैसे उत्पन्न हुई एवं कर व्यवस्था का प्रारंभ कैसे हुआ तथा बस्तियों की किलाबंदी ,प्रशासन तंत्र एवं स्थाई सेना की स्थापना कब और कैसे हुई इत्यादि और विभिन्न तत्वों ने राज्य के विकास को किस प्रकार बढ़ावा दिया ।विकल्प के रूप में प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करके यह देखा जा सकता है की यह प्रक्रियाएं कितनी जटिल थी और अंततः ब्राह्मण एवं क्षेत्रीय शक्तिशाली गणमान्य के रूप में क्यों और कैसे हो गए थे जिससे कि यह समाज के अतिरिक्त उत्पाद के महत्वपूर्ण भाग का उपयोग करते जबकि अन्य वर्ग कर अदा करने और श्रम करने को सहमत हुए। 

सगोत्रीय संगठन प्रारंभिक समाज की विशेषता थी ।गोत्र ,व्रज श्राद्ध और यहां तक कि ग्राम जैसे शब्दों का आशय उन व्यक्तियों के उस समूह से था ,जो एक दूसरे के साथ वास्तव में सगोत्रीय  रूप से जुड़े हुए थे। ऐसे समूहों के द्वारा अपने पशुओं का पालन किया जाता था। वे आखेट पर जाते थे तथा शत्रुओं से एक इकाई के रूप में युद्ध करते थे ।सामूहिक जीवन निर्माण की आवश्यकता पर आधारित, ये संगोत्रीय समूह संभवतः सामुदायिक जीवन पद्धति से मिलते- जुलते थे ।एक प्रमुख इनकी प्रत्येक इकाई की अगुवाई करता था जिसको हमें बाद के राजा के अर्थों में नहीं लेना चाहिए। ऋग्वैदिक काल के बाद के भाग में हमें बताया जाता है कि हमारे सामने जन तथा विस जैसी बड़ी संगोत्रीय इकाइयां  आती है ,जिनकी तुलना क्रमशः कबीले या कुल से भी की जा सकती है ।प्रमुखो या प्रधानों को जनास्मगोप्त, गोप जिस्म अथवा विसपति कहा जाता था। यह सभी शब्द उनकी पशुपालक अथवा रक्षक की भूमिका पर बल देते हैं।

कबीलों के बीच अंदरूनी संघर्ष के और अन्य कबिलो के संघर्ष के प्रमाण मिलते हैं ।इन संघर्षों के दौरान कबिलो के प्रमुखों की भूमिका के परिणाम स्वरुप उनकी स्थिति मजबूत होती थी। जय एवं  पराजय दोनों घटनाक्रमों में एवं सजातीय निष्ठा की क्षीण  होने पर प्रमुखों को व्यवस्था एवं संगठन बनाए रखने के लिए कुछ तरीकों को अपनाना पड़ता था। इन भूमिकाओं के अतिरिक्त प्रमुख ऋगवैदिक सभाओ जैसे की सभा, समिति, विधता एवं गण की अध्यक्षता करता था ।सामुदायिक धन तथा सफल हमलों के दौरान लूटपाट से प्राप्त धन संपत्ति कबीले के सदस्यों के बीच समान रूप में वितरित कर दिया जाता था। विभिन्न अवसरों पर व्यक्तिगत रूप से सदस्य जो कुछ उनके पास होता था, उसमें से कुछ अंश प्रमुख को उसके नेतृत्व के लिए भेंट में देते थे। इन उपहारों को प्रमुख सामान्यताः सामुदायिक भोज के दौरान उन्हें पुनवितरित कर देता था। उस समय क्योंकि चारागाही पर आधारित अर्थव्यवस्था थी और धन संचित कर पाना कठिन कार्य था:अतः रिग वैदिक समाज की प्रकृति ही सामानतावादी थी। ऋग्वेद के अंत में' पुरुषसूक्त' में चार वर्णों का उल्लेख होते हुए भी, जिसे बाद में जोड़ा गया क्षेपक माना जाता था, समाज  समानतावादी ही बना रहा फिर भी जहां तक राजनीतिक विकास का प्रश्न है ,प्रमुखों ,उनके स्तर में बढ़ोतरी ,उनकी नेतृत्व करने की भूमिका एवं उनकी प्रशंसा में चारणों द्वारा रचे गए गीतों के कारण ही हुई थी, जिनको उनसे उपहार मिलते थे।

 परवर्ती वैदिक काल भी संक्रमण काल था, जिसमे कुछ क्षेत्रों में तेजी से घटनाक्रम सामने आई जो राजनैतिक व्यवस्था को राज्य व्यवस्था की तरफ ले गए। पूर्व की ओर गतिविधियों का केंद्र हो गया था जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उससे लगे हुए हरियाणा एवं राजस्थान के क्षेत्र वैदिक साहित्य एवं धूसर रंग की मृदभांड संस्कृति जो प्रथम सहस्त्राबिद ईसवी पूर्व के प्रारंभिक भाग से संबंधित है ,के बीच में कालकमम्र और  स्थानिक सभ्यता के आधार पर यह सोचा जाता है कि मूल ग्रंथों के लेखक एवं पुरातत्वीय संस्कृति के लोग एक ही थे।इसी कारण से उस समय की भौतिक संस्कृति की रचना इन दोनों स्त्रोतों के संयुक्त साक्षयो के  आधार पर की गई। लोग कृषि तथा पशुपालन दोनों ही काम करते थे ।गेहूं ,चावल, दालें ,मसूर आदि की जानकारी थी ।खाद्य पदार्थों की सुनिश्चित आपूर्ति से छोटे एवं बड़े बली अनुष्ठानों की आवश्यकता की पूर्ति होती थी और इससे दोआब क्षेत्र बली का केंद्र बिंदु बन गया। राजवंशीय बली ,जैसे राजसूय एवं  अश्वमेघ ने राजत्व की विचारधारा को हजारों वर्ष तक प्रभावित किया। अनुष्ठानों में उर्वरता के तत्वों का समावेश था, जिनका संबंध पृथ्वी को प्रसन्न करने एवं उत्पादन में वृद्धि करने से संबंधित था, इनके अतिरिक्त ये प्रमुखों और उनके सहयोगियों के स्तर को ऊंचा करने में भी सहायक थे ।हमें राजन शब्द एवं उसके  विस्तृत रूप जैसे राजन राजन्य बंधु एवं क्षत्रिय का प्रयोग देखने में आता है ।वेसे जहां राजन शब्द का अर्थ प्रमुख या प्रधान  होता था ।वहां क्षत्रिय  शब्द का मूल अर्थ 'क्षत्र 'था ,एक शक्तिशाली लोगों के समूह का प्रतीक था। बलि के अवसर पर सामुदायिक भोज की प्रथा का निर्वाह केवल राजन कर सकता था और इन अनुष्ठानों के सफल निष्पादन का आशय इनके कता राजन को देवी वरदान एवं गुण प्रदान करना था। इन कार्यों से उसका महत्व बढ़ता था।

'राजन 'अथवा ' क्षत्रिय ' के शक्तिशाली बनने की प्रक्रिया इतनी सरल नहीं थी ।यह एक दीघकालिक प्रक्रिया थी। अनुष्ठानों एवं बिम्बविधानो के संपूर्ण कम्र का सार्वजानिक प्रचार राजन के आधिपत्य को स्थापित करने एवं समुदाय को अधीनस्थ स्थिति में रखने के लिए किया जाता था। मौसम के शुरू में कृषि कार्य प्रारंभ होने पर राजा अनुष्ठान के रूप में उस में भाग लेता था और एकता प्रदर्शित करने के लिए' विस'सदस्यों के साथ का सहभोज का आयोजन करता था ।इसी के साथ ग्रंथों में चतुर उपमाओ का प्रयोग करके उसकी श्रेष्ठ कृतियों पर बल दिया जाता था उदाहरण के लिए राजा और इसकी तुलना क्रमशः हिरण एवं गौ अथवा अश्व और  अन्य साधारण पशु से की गई थी ।उस काल की संक्रमण की ओर ले जाने वाले प्रकृति का सार समुदाय के साथ एकजुटता तथा दूसरी ओर विभेदीकरण जैसे अस्पष्ट दृष्टिकोण है ।राजन एक ओर समुदाय का सदस्य था और दूसरी ओर सामान्य हित में लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन में वह उनसे अलग और ऊपर था ।ऐसी अनिन्वायर्ता का समाधान अनुष्ठान के माध्यम से होता था। राजन्य क्षत्रियों के उदय के साथ ब्राह्मणों के स्तर में भी बढ़ोतरी हुई ।कृत्यों में ब्राह्मण महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे और इस प्रकार वे 'राजन' के स्तर की वृद्धि करने में सहायक है इसमें संभवत ब्राह्मण क्षत्रिय संबंध स्पष्ट होता है ।इसे एक ही वैधता प्रमाणित होती थी,  तो दूसरे को संरक्षण प्राप्त होता था। इससे प्राचीन भारत मे शक्तिशाली विशिष्ट वर्ग का जन्म हुआ। ब्राह्मण क्षत्रिय  का प्रभुत्व और 'विस ' अधिनस्थ होना सुनिश्चित करने के लिए य यज्ञ की उचित विधि का वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में किया गया है।

कुछ कार्य जैसे कि उपनयन आदि वर्ण एवं लिंग से संबंधित असमानता को महत्व देने के लिए किए जाते थे। शुद्रो की तरह स्त्रियां भी इससे अलग रहती थी।  तीनों उच्च वर्ण के द्वारा ऐसे संस्कारों का पालन करने की विधि विधान से संबंधित बारीकियो मैं अंतर होता था जो उनके पद अनुक्रम का प्रतीक था ।इसी तरह कृतियों में गोत्रों से बाहर के समूह भी सम्मिलित किए जाते थे ,जिससे सगोत्रिय बंधन कमजोर होते थे और विभेदीकरण प्रक्रिया के उभरने में सहायक मिलती थी ।राज्य सरंचनाके लिए आवश्यक था,क्योकि विशिष्ट वर्ग की निम्न वर्गों पर निर्भरता थी अतः निम्न वर्गों के सदस्यों को कृतियों में सम्मिलित करके सामाजिक एकता के आडंबर को बनाए रखता था जैसा कि वैश्यो को आर्य कहना ।फिर भी, इन सब से समाज का वर्ण विभाजन नहीं रोक पाया। ब्राह्मण वादी साहित्य में प्रमुख के पद को कुटुंब में पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखने के तरीके बताए गए हैं फिर भी उनका चुनाव ही होता रहता था ।ऐसा लगता है कि वंशानुगत उत्तराधिकारी अनिवार्य रूप से सबसे जेष्ठ पुत्र ही ना होकर सबसे प्रिय पुत्र होता था ।भू-सीमांकित  क्षेत्र से संबंधता कि धारणा भी प्रचलन में आ रही थी उसका पता राष्ट्रप तथा जनपद जैसे शब्दों के प्रयोग से चलता है। फिर भी  कर अभी औपचारिक एवं नियमित रूप से नहीं वसूले जा रहे थे 

प्रारंभिक काल की बलि की प्रथा जो प्रेम से दी गई भेंट के रूप में प्रचलित थी ,अब लगभग अनिवार्य होती जा रही थी। राजस्व एकत्र करने वाले अधिकारियों एवं प्रशासनिक कर्मियों की अनुपस्थिति बिल्कुल स्पष्ट है ।रत्ननो को जिनकी राज्याभिषेक समारोह मैं विशेष भूमिका थी ,किसी प्रकार के ऊपर अधिकारी वर्ग के रूप में देख सकना कठिन है ।जब क्षेत्र की सुरक्षा का प्रश्न उठता था ,किसी संगठित सेना की उपस्थिति में हुई सामूहिक रूप से यह काम करता था ।परिवर्तित वैदिक काल के अंत में राज्य व्यवस्था के संघटक तत्व सामने आ गए थे या दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कृषक समुदाय ने राज्य व्यवस्था की शुरुआत में भूमिका निभाई ।परंतु अभी भी राज्य का पूर्ण रूप से उदय नहीं हुआ था यह तर्क दिया जाता है कि लोहे का अभी भी उत्पादन प्रक्रिया में पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया था पैदावार से आवश्यक अतिरिक्त उत्पादक नहीं हो रहा था एवं अश्वमेध वाजपेय पर जैसे युवाओं में पशुओं का वध तथा अपव्ययी  उपभोग इत्यादि मिलकर राज्य को उभरने से रोक रहे थे।

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