बिगड़ैल बच्चे प्रश्न उत्तर
यह हाल है हमारे देश की युवा पीढ़ी का के आधार पर बिगड़ैल बच्चे कहानी की समीक्षा करें ।
अथवा
दिन पर दिन बदतमीज होते जा रहे हैं संस्कार बचे ही नहीं के आधार पर बिगड़ैल बच्चे कहानी की समीक्षा करें ।
अथवा
हमारी यंग जनरेशन पूरी की पूरी ऐसी है के आधार पर बिगड़ैल बच्चे कहानी की समीक्षा करें ।अथवा
कुछ कर दिखाने कुछ बनने बनाने की ना तो काबिलियत है ना अपना हिम्मत सोशल वैल्यूज के नाम पर जीरो-- के आधार पर बिगड़ैल बच्चे कहानी की समीक्षा करें।
अथवा
क्या यह मुसीबत को समझदारी से सुलझा सकेंगे खतरों से बच सकेंगे के आधार पर आज की युवा पीढ़ी का चित्रण बिगड़ैल बच्चे कहानी में की गई है इस पर चर्चा करें ।
अथवा
युवा हमें वृद्धा आश्रम के अलावा क्या देंगे ?महा स्वार्थी है यह पीढ़ी के ।--आधार पर मनीषा कुलश्रेष्ठ की "बिगड़ैल बच्चे" कहानी की समीक्षा करें ।
उत्तर-- मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी 'बिगड़ैल बच्चे 'आज के युवा वर्ग का चित्रण करने वाली कहानी है ।कहानी के आरंभ में जब 3 युवा एक लड़की, एक लड़का मित्र तथा छोटा लड़का जो कि लड़की का भाई है ,जब लेखिका के डिब्बे में प्रवेश करते हैं --पहली नजर में 'बिगड़ैल बच्चे 'नजर आते हैं लेखिका को ऐसा लगता है कि यह लापरवाह किस्म के हैं ।लेखिका उन बच्चों के बारे में उनके कपड़े ,पहनावे तथा व्यवहार को लेकर कई टिप्पणी करती है करती है ।लेकिन साथ हीइस बात को स्वीकार भी करती है कि यह गलती उनके साथ हमारे समाज की तथा संस्कारों की थी है ।सच तो यह है कि आज की युवाओं में तो जो लापरवाही तथा पश्चिमी सभ्यता में डूब जाने की ललक दिखाई पड़ती है, उसके जिम्मेदार भी हम हैं ।सबसे बड़ा कारण तो यह है कि आजादी के बाद देश में एक राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का प्रयास तक नहीं किया गया ।नेताओं की अदूरदर्शिता तथा आदर्श बिखर गए। उस टूटनऔर बिखराव की कोख से जन्म लेने वाला वर्ग ही आज का युवा वर्ग है ।उसी का नतीजा है कि प्रत्येक क्षेत्र में दिशाहीनता की स्थिति है ,अगर हमने युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण की धारा के साथ जोड़ने का प्रयास किया होता तो यह देखने सुनने को नहीं मिलता---' जिस खिड़की के पास वह लड़की बैठी थी वहां दो चार सड़क छाप मनचले मंडराने लगे थे ,सड़क छाप हिंदी के कुछ गंदे फिकरे कसे गए ,जो लड़की को समझ नहीं आया पर उसने महसूस किया कि उसके कपड़ों पर कुछ कहा गया ।उसके आधी खुली पीट वाला ,छोटा सा बड़े गले का नाभि दर्शना टॉप पहना हुआ था ,नाभि में चांदी की बाली पहनी हुई थी '।
इन सबके बावजूद निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज का युवा वर्ग अपनी जड़ों से कटा हुआ नहीं है। कहीं ना कहीं कोई है जो उसे सही दिशा निर्देश दे रहा है---- "होते हैं ,आंटी सेल्फिश लोग भी। हमको हमारा मम्मी बोला इंसान का सेवा ही यीशु का सेवा है ।"
लेखिका को संकट में देखकर उसकी देखभाल करने वाला युवाओं को देखकर यह लगता है कि हमें युवाओं से निराश होने की आवश्यकता नहीं ---"आवश्यकता केवल के सुभाष चंद्र बोस तथा गांधी जैसे मार्गदर्शक की है क्योंकि ---जो भी हो इन्हीं पर हमारा भविष्य टिका है "।
कहानी का अंत इस उम्मीद का प्रतीक है कि हम जिसे 'बिगड़ैल 'रहे हैं, जिसे जेनरेशन गैप कह रहे हैं --वह अभी उतनी गहरी नहीं हुई है जिसे पाटा ना जा सके ।फिर भी अनदेखा की जाने लायक नहीं है ।एक गंभीर बात है ---जिसका प्रभाव" बिगड़ैल बच्चे" पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
Comments
Post a Comment