राम भक्ति धारा
राम भक्ति शाखा का सामान्य परिचय देते हुए इसकी साहित्यिक प्रवृत्तियों को लिखें
वैदिक धर्म के कर्मकांड की प्रतिक्रिया में एक ही साथ दो धर्मों का उदय हुआ बौद्ध धर्म और वैष्णव धर्म यह दोनों धर्म अहिंसा उदारता और सदाचार की भावनाओं को लेकर खड़े हुए बौद्ध धर्म तो आत्म शुद्धि के प्रचार में लग गए और वैष्णव धर्म ने भगवान की भक्ति का आश्रय लिया आगे ।चलकर यही वासुदेव के दो रूप राम और कृष्ण माने जाने लगे कालांतर में भक्ति की यही धारा हिंदू साहित्य में प्रकट हुई।
विक्रम की 14 वी में श्री संप्रदाय के प्रधानाचार्य श्री राघव आनंद हुए राघवानंद रामानंद को दीक्षा निश्चित हुए। रामानंद ने उत्तर भारत में राम भक्ति की लहर चलाई, उन्हीं के अनुकरण में हिंदी के भक्ति काल में राम भक्ति साहित्य का उद्भव हुआ ।राम भक्ति धारा में अनेक कवि हुए किंतु राम भक्ति धारा का साहित्यिक महत्व अकेले तुलसीदास के कारण है राम भक्ति साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियां निम्नलिखित है :-
1) राम का स्वरूप :-राम भक्त कवियों के उपास्य देव राम विष्णु के अवतार हैं और परम ब्रह्म स्वरूप है राम विष्णु के अवतार भक्त कवि मानव रूप में उनके साधक है वह पाप का विनाश और धर्म उद्धार के लिए युग युग में अवतार लेते हैं ।
2) समन्वय की भावना:- राम काव्य का दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक है। उसमें एक विराट समन्वय की भावना है ।इसमें ना केवल राम की उपासना है बल्कि कृष्ण, श्री गणेश ,शिव।आदि देवताओं की भी स्तुती की गई है ।तुलसी के सेतुबंध के अवसर पर राम द्वारा शिव की पूजा करवाई है यद्यपि राम भक्ति काव्य में राम भक्ति को श्रेष्ठ माना है फिर भी उसकी भक्ति भावना का अत्यंत उदार है।
3)लोक संग्रह की भावना:- लोक कल्याण भावना की दृष्टि से भी यह साहित्य अत्यंत उपादेय है। इस साहित्य में जीवन के अनेक उच्चारण भुमियां प्रस्तुत की गई हैं ।इन्होंने ग्रहस्थ जीवन जीवन की उपेक्षा नहीं की बल्कि लोकसेवा और आदर्श ग्रहस्थ राम सीता को उपस्थित करके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का स्तुत्य प्रयत्न किया है।
भक्ति का स्वरूप राम का चरित्र त्रिलोकातिशायी है। राम भक्त कवि राम की शील शक्ति और सौंदर्य पर मुग्ध है। यही कारण है कि राम भक्त कवि ने अपने और राम के बीच सेवक सेव्य भाव को स्वीकार किया है।
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