कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी

*"काव्य एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है -मात्र व्यक्तिगत नहीं"

 प्रस्तुत पंक्ति गजानन माधव मुक्तिबोध के निबंध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है ।

यशराज के अनुसार साहित्य सृजन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह सांस्कृतिक संस्था है व्यक्तिगत नहीं ।अनेक लोगों की भावनाओं का साहित्य के समावेश साथ होना चाहिए । हालांकि कवियों को यह स्वतंत्रता/ छूट है कि वह स्वांग रचे, अपने कल्पनाओं के अनुसार कुछ भी लिखें लेकिन इस बात को याद रखना चाहिए कि काव्य सिर्जन व्यक्तिगत  नहीं , जिसे अपनी रुचि अनुसार सजाया जा सके बल्कि इसे समाज के अनुसार करना जरूरी है।

* "दोनों ने अपने आसन बदले ।

मैंने सुनी की ओर देखना शुरु किया।

 उस सुनने में मुझे दो बातें नजर आए।"

               प्रस्तुत पंक्ति कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है जिसके लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध जी हैं।

      यशराज की आलोचना से स्तंभित होकर लेखक ने शून्य  की ओर दोखना शुरू किया और उसे दो बातें नजर आई ।।पहली बात तो यह कि मानसिक प्रतिक्रिया जिस वस्तु के प्रति होती है उस वस्तु का भी चित्रण आवश्यक है ।दूसरी बात यह है कि साहित्य को प्रकट करने के  लिए यह जरूरी है कि उस वस्तु से जुड़े तथ्यों के प्रति सही-सही मानसिक प्रतिक्रिया करें।

* "इस प्रवृत्ति ने आत्म पक्ष को गौण स्थान दिया"

     प्रस्तुत पंक्ति गजानन माधव मुक्तिबोध निबंध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी एक से ली गई है।

       प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से यशराज ने मध्यकालीन काव्य अर्थात रीतिकालीन काव्य की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है। रीतिकालीन साहित्य दरबारी साहित्य था ,उसका उद्देश्य केवल अपने आश्रयदाताओं को खुश करना था ।इस प्रक्रिया में रीतिकालीन कवियों ने केवल वस्तु पक्ष को ही अपने काव्य में प्रधान प्रधानता दी।वहां आत्मपक्ष गौणहो गया। यही कारण है कि रीतिकालीन काव्य जनसामान्य के को छूने में असफल रही ।

*"नई कविता की भी एक लीक पड़ गई है वह भी एक ढर्रा है"

प्रस्तुत कांति गजानन माधव मुक्तिबोध के निबंध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है ।

इस पंक्ति में यशराज कविता में  आत्म पक्ष तथा भाव पक्ष की जरूरत पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहता है कि किसी कविता की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि साहित्य में उसकी लिंक है या नहीं ।उसका अपना शिल्प- विधान है या नहीं नई कविता में या साहित्य में जो अपना स्थान बनाए उसके पीछे भी मनुष्य है और इसका कारण यह है कि इसकी दो मुख्य- प्रवृतियां व्यक्तिगत तथा यर्थाथवाद  थी इसलिए नई कविता भी एक लीक पर चलने वाली कविता है और कविता का भी एक ढर्रा है। 

*"जिसे तुम नयी कविता कहते हो उसने भी फ्रॉड कमी नहीं है"

        प्रस्तुत पंक्ति गजानन माधव मुक्तिबोध निबंध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है ।

       यशराज के कहने का आशय है कि नई कविता का प्रमुख लक्षण निजी मान्यताओं विचारधाराओं एवं अनुभूतियों का प्रकाशन करना है ।व्यक्तिगत या प्रवृत्ति रितिकालीन के स्वच्छंद श्रिंगारी कवि तथा आधुनिक के छायावादी कवियों में भी मिलती है लेकिन उन्होंने अपनी अनुभूतियों को इस प्रकार सामने रखा है कि वह पाठक के हृदय को आंदोलित कर सके नई कविता के कवियों में वह बात नहीं मिलती ।

उदाहरण के लिए भारत भूषण की कविता की इन पंक्तियों को देख सकते हैं --

"साधारण नगर के

 एक साधारण घर में 

मेरा जन्म हुआ ,

बचपन बीता अति साधारण 

साधारण खान-पान

 साधारण वस्त्र वास ।

इसमें आत्म विज्ञापन के अलावा और क्या है जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर सके।

*"व्यक्तिगत ईमानदारी वह है, जहां लेखक वस्तुमुल्क आंकलन करते हुए, उस आकलन के आधार पर वस्तु तत्व के प्रति सही मानसिक प्रतिक्रिया करें"

       लेखक ने जब अपनी डायरी को यशराज को दिखाया तो यशराज में उसकी डायरी को पढ़कर डायरी  को फ्रॉड घोषित कर दिया और डायरी को फ्रॉड घोषित करने के पीछे वह व्यक्तिगत ईमानदारी की पुनरावृति को आधार बनाता है। वह कहता है क्या तुम जानते हो कि व्यक्तिगत ईमानदारी की परिभाषा क्या है? यशराज लेखक से कविता के संबंध में कहता है कि काव्य की भावना की इमारत ज्ञान और बोध के आधार पर खड़ी होती है ,यदि  ज्ञान और बोध की बुनियाद गलत होगी तो भावना की इमारत भी वेडौलऔर बेकार होगी एवं उसका असर काव्य शिल्प पर होगा। व्यक्तिगत ईमानदारी वहीं  ही दिखाई देगी जहां लेखक या कवि वस्तु का वस्तुमुलक आंकलन करते हुए आकलन के आधार पर वस्तु के प्रति सही-सही मानसिक प्रतिक्रिया करें ।यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसकी प्रतिक्रिया में सबसे का अभाव होगा।

*" डायरी डायरी मैंने मेहनत से बनाई थी "

संदर्भ-------- 'वसुधा 'के संपादक हरिशंकर परसाई ने नयी कविता तथा साहित्य के भाव विचार, संवेदना व  अभिव्यक्ति के संबंध में अपने विचार लिखकर भेजने के लिए मुक्तिबोध को उकसाया था ।उनकी प्रेरणा से मुक्तिबोध ने उस पर लिखा था किंतु उनकी पड़ोसी यशराज ने जब उसे सुना तो तुरंत उस पर टिप्पणी की डायरी बिलकुल फ्रॉड है ।मुक्तिबोध को इस तरह की जवाब की जरा  भी उम्मीद नहीं थी उन्हें अपनी मेहनत व प्रशंसा की उम्मीद थी ।उनकी उम्मीदों पर कुठाराघात हुआ इसी भाव को लेखक ने यहां व्यक्त किया है ।

 व्याख्या - हरिशंकर परसाई की प्रेरणा से मुक्तिबोध ने वसुधा पत्रिका के लिए बड़े ही श्याम से डायरी लिखें और उस डायरी को अपने पड़ोसी यशराज को पढ़कर सुनाया ,लेकिन उस डायरी को उसने फ्रॉड घोषित कर दिया । अतः लेखक को लगता है लगता है कि एक संपादक हरिशंकर परसाई के द्वारा कई बार पत्र लिखकर डायरी लिखने के लिए दवाब डाला गया उस दबाव के कारण लेखक ने परिश्रम कर यह डायरी लिखी। और जीते मोहल्ले के  लोगों के द्वारा हंसने वाले एक व्यक्ति ने झूठा साबित कर दिया। अतः उन्हें लगता है कि उनका पूरा मेहनत बेकार हो गया और वह राख में मिल गया।


*"जो भाव या जो विचार जिस रूप को लेकर जिस मात्रा में और जिस अनुपात में प्रस्तुत हुआ है उसको उसी रूप में प्रस्तुत करना एकदम ना काफी है। महत्वपूर्ण की बात यह है कि वह भाव या वह किसी वस्तु तथ्य से सुसंगत है या नहीं"

 ------ प्रस्तुत गद्यांश कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है। यह अंश मुक्तिबोध द्वारा रचित "एक साहित्यिक की डायरी "का पहला भाग है, जो हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी पाठ संचयन में संकलित किया गया है। 

 प्रसंग ---जब लेखक अपने मित्र यशराज को बहस के दौरान व्यक्तिगत ईमानदारी का अर्थ एवं गुण धर्म बतलाता है तो यशरज लेखक के इस बात से आज सहमत होकर अपनी बात कहता है ।

व्याख्या---------       यशराज का मत है कि जो भाव या विचार लेखक या कवि के मन में उठते हैं उसे उसी मात्रा अनुपात एवं स्वरूप में अभिव्यक्त कर देना काफी नहीं होता है क्योंकि महत्वपूर्ण यह है कि भाव य विचार किसी वस्तु तथ्य से सुसंगत है या नहीं यह देखना आवश्यक होता है ।व्यक्तिगत ईमानदारी को महत्व देने वाले उसे पैरोकार वास्तव में भावना विचार के सिर्फ सब्जेक्टिव पहलू के चित्रण को ही महत्व देते हैं और उसे भाव सत्य या आत्मशक्ति की उपाधि देते हैं ,किंतु उसका एक ऑब्जेक्टिव पहलू भी होता है जिसे वह भी भूल जाते हैं।


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