Hindi important questions -answers2023 west Bengal council of secondary education class 12

 "कुटज अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा करता है" इस कथन को प्रमाणित कीजिए। 

                  अथवा

"जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर ,पाताल की छाती चीर कर ,अपना भोग्य संग्रह करो, वायुमंडल को चूस कर ,झंझा -तूफान को रगड़कर ,अपना प्राप्य वसुल लो, अवकाश की लहरों में झूम कर, उल्लास खींच लो"।

    उतर ---   प्रस्तुत पंक्ति हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा रचित निबंध कुटज से ली गई है। इस निबंध में लेखक ने कुटज के माध्यम से जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला है ।

                वह कहते हैं कि कुटज हमें अपराजेय जीवनी शक्ति का संदेश देते हैं क्योंकि कुटज ऐसे स्थान पर अपने आप को बनाए रखता ,हैं जहां पर भीषण  / प्रचंड गर्मी के कारण कोई और पौधा अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाती है ऐसी परिस्थिति में भी कुटज हरा भरा और फूलों से लदा रहता है।  विपरीत परिस्थिति में भी अपने अस्तित्व को बनाए रखना , संघर्ष और  साहसी बने रहना ,कुटज की विशेषता है। तूफान से रगड़ कर चट्टानों को भेदकर अपने लिए भोजन पानी की व्यवस्था करता है जिससे प्रमाणित होता है कि कुटज में जिजीविषा बनाए रखने की इच्छा प्रबल है ।यह प्रमाणित करती है कि विपरीत परिस्थिति में भी जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

2)  " दुख और सुख तो मन के विकल्प है। सुखी वह है जिसका मन वश  में है, दुखी वह है जिसका मन परवश र्में है ।पररवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दांत निपोरना ,चाटुकारिता, हां हुजूरी"।

                                अथवा 

   "दुख और सुख तो मन के विकल्प है "

       संदर्भ --प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य पुस्तक पाठ संचयन के पाठ कुटज से अवतरित किया गया है जिसके रचयिता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की है ।

प्रसंग  ----प्रस्तुत पंक्ति में कुटज की अपराधी जीवनी शक्ति पर प्रकाश डालते हुए उसके प्रेरणादायक जीवन के प्रति निबंधकार अपने श्रद्धा को  प्रकट करते हैं।

व्याख्या  -- प्रस्तुत निबंध में निबंधकार "कुटज "के माध्यम से मनुष्य को यह समझाते हैं कि मनुष्य जिस दुख और सुख की बात करता है ,वह केवल मनुष्य के मन के वैकल्पिक भाव है।वे आगे कहते हैं कि संसार में वह व्यक्ति सुखी है जिसने अपने मन पर  अपना वश कर लिया है क्योंकि मन ही वह तत्व है जो मनुष्य को सुखी या दुखी बनाता है। आगे निबंधकार कहते हैं कि जिसका मन दूसरों के वश में होता है, वह दुखी होता है।  दूसरों की खुशामद करना ,उसके आगे उसकी चाटुकारी करना चापलुसी करना ,यह पराधीनता  के चिन्ह माने गए है।

3)       "रूप व्यक्ति सत्य है ,नाम समाज सत्य"

उतर--- प्रस्तुत पंक्ति में रूप और नाम की महत्व पर विचार करते हुए निबंधकार इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नाम के बिना रूप की पहचान नहीं हो सकती अतः नाम को रुप से बड़ा माना स्वाभविक है।

व्याख्या।     प्रस्तुत निबंध में लेखक कहते हैं कि रूप का संबंध व्यक्ति से है तथा नाम का संबंध समाज से है ।रुप व्यक्ति के साथ संबंध है तथा वह व्यक्ति सत्य है ,लेकिन व्यक्तियों की पहचान नाम से जुड़ी होने के कारण उसकी पहचान उसके नाम से होती है इसीलिए लेखक कहते हैं कि नाम का महत्व रूप के महत्व से अधिक है । उनके अनुसार नाम के महत्व को इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि व्यक्ति की पहचान उसके नाम से होती है।



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