Hindi Important questions 2023Hindi 12 west Bengal council of secondary education

 पठित दोहे के आधार पर कवि के विचारों पर प्रकाश डालिए।  ---------------------------अथवा --------------------

 कबीर के पद में व्यक्त विचारों को स्पष्ट कीजिए 

_---------------------------अथवा---------------------

गुरु प्रेम और जगत के संदर्भ में वर्णित कबीर के भाव को स्पष्ट कीजिए।

उतर --कबीर दास जी अशिक्षित होते हुए भी उन्होंने संसार के सत्य को जानने के लिए अपने ही जीवन को प्रयोगशाला के रूप में ग्रहण किया। कबीर दास ने अपने जीवन और काव्य दोनों में सद्गुरु को बहुत अधिक महत्व दिया है।  उनका कथन है कि सच्चे गुरु तभी प्राप्त होते हैं जब ईश्वर की कृपा होती है अरे ऐसे गुरु को हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए

कबीर का मानना था कि यदि सच्चे गुरु को प्राप्त करना है तो निस्वार्थ भाव से गुरु के प्रति समर्पित होना चाहिए कोई भी साधना तभी सफल हो सकती है जब उसे ज्ञानी गुरु और सच्चा निष्ठावान शिष्य मिलता है समाज में अधिकांशत गुरु इस दाँव में लगे रहते हैं कि उनके यहां शिष्यो मंडली एकत्र हो जाए अर्थी से इस गांव में रहते हैं कि किसी सुप्रसिद्ध गुरु का शिष्य पहला कर वह महत्व प्राप्त कर लें परंतु सच्चे गुरु और शिष्य के अभाव में साधना और भक्ति प्राप्त नहीं हो पाती कबीर दास ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम को सबसे सरल मार्ग बतलाया है उनका कहना है कि मनुष्य के हृदय में अभिमान रहने पर भगवान उनसे दूर रहते हैं तथा मनुष्य के हृदय में अगर भगवान का निवास होना चाहिए तो मनुष्य के मन में अभिमान दूर रखना अनिवार्य है प्रेम का रास्ता अत्यंत सकरा है जिसमें अभिमान और प्रेम एक साथ नहीं चल सकता कबीर के अनुसार ब्रह्म सर्वत्र प्रप्त है य सृष्टि उसी ब्राह्मण से है इसे कबीर ने बड़े ही रोचक शब्दों में उदाहरण देकर बताया है यदि समुद्र के जल में घड़े को डुबो दिया जाए तो खड़े ने जल भर जाएगा और जब खड़े में भी जन होगा और खड़े के बाहर भी जल होगा तो घड़े को वोट देने पर घड़े का जल और समुद्र का जल एक हो जाएगा ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि रूपी घड़े के भीतर बाहर परमात्मा विद्वान है यह शरीर रूपी खर्च हो जाएगा जीवन आत्मा और परमात्मा एक हो जाएंगे।

2) अवकाश वाली सभ्यता कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए ।

उतर---- अवकाश वाली सभ्यता हिंदी साहित्य के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा लिखित है। इस कविता के माध्यम से कवि यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य सुखों से इतना ग्रसित है कि वह विज्ञान के माध्यम से आविष्कार पर आविष्कार किए जा रहा है ।इस आविष्कार के कारण को अकर्मण्य और आलसी बनता जा रहा है। दिनकर जी प्रस्तुत कविता के माध्यम से अपनी चिंता व्यक्त करते हैं कि जिस तरह से मनुष्य अविष्कार पर आविष्कार कर रहा है ,वह आने वाले समय में ना जाने कितनी समस्याओं से घिर जाएगा ,जिसका मनुष्य को किसी भी तरह का आभास नहीं है।

कविता में कभी कहते हैं कि मैं अंधेरे से प्रकाश की ओर देखता हूं और उसकी रोशनी जो है उसे भविष्य तक लेकर जाती हैं कभी कहते हैं तूने यह अंदेशा है कि दुनिया चाहे लाख बदल जाए लेकिन भारत भारत ही बना रहेगा भारतवासी भारतीय हिंदू की नजर में बैलगाड़ी के समान है युद्ध की वजह से जो ज्योति बुझी जा रही है वह भारत में चलेगी और यांत्रिक तावाद के प्रतिरूप थकी हुई धरती उस नई रोशनी में चलेगी कहते हैं कि जब मानवता यांत्रिक का वाद के थक जाएगी तो आगामी मूल्य पीठ भारत के साबरमती पांडिचेरी किरवंत मलाई और दखिनेश्वर होंगे वह कहते हैं कि भारत युवा स्थान है जहां से ही से शीतलता की धारा रहेगी और वह दुनिया को शीतल कर देगी वो कहते हैं आदमी सुखों से इतना ग्रसित है कि यह सुख की लालच की उसे एक दिन मारेगा कविता में गांधी जी की बात कहते हुए दिनकर जी कहते हैं कि गांधी जी कहते थे कि अवकाश बुरा है इसीलिए इंसान को चाहिए कि हमेशा वह किसी काम में लगा रहे क्योंकि अधिक अवकाश आदमी की आत्मा को उड़ने के लिए मजबूर कर देती हैं कहते हैं कि जब आदमी के पास कोई कार्य नहीं रहेगा क्योंकि और दो ही करण और अविष्कारों के कारण उसके पास कार्य की कमी हो जाएगा तो खाएगा पिएगा मस्त रहेगा उस थिस सुखों को होगे गा लेकिन अवकाश से वह तक रहेगा ताकि वह कहते हैं कि सारा भार विज्ञान पर डालना गलत है क्योंकि मनुष्य को चाहिए कि वह कुछ ना कुछ काम करते रहना चाहिए।

प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि कहते हैं कि भौतिकवादी होकर इंसान बेकार हो गया है विज्ञान ने उसे अत्यधिक सुख प्रदान कर दिया जिससे कि वह अब अकर्मठ हो गया है और परिणाम स्वरुप वह स्वयं विनाश की ओर जा रहा है ।अंत में कवि दिनकर जी सभी मानव जाति को यह संदेश देते हैं कि सिर्फ विज्ञान के आविष्कारों से ही नहीं मनुष्य को खुद भी कोई काम करते रहना चाहिए क्योंकि यदि थका हुआ व्यक्ति आराम करता है तो वह मनुष्य के लिए और समाज के लिए दोनों के लिए ही लाभदायक होता है ।इस प्रकार हम देखते हैं कि अब "अवकाशवाली सभ्यता" कविता अपने मूल भाव में वर्तमान की चुनौतियों को रेखांकित करती है।

3) सप्रसंग आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए:-

          "मदिरा की वह नदी बहाती आती 

थके हुए जीवो को वह  सस्नेह

 प्याला एक पिलाती है"

संदर्भ ----प्रस्तुत कविता "सूर्यकांत त्रिपाठी निराला" जी द्वारा रचित' संध्या सुंदरी 'कविता नामक पाठ से लिया गया है यह कविता कवि के संकलन अपरा में संकलित है जिसे हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी पाठ संचयन में भी संग्रहित किया गया ।

व्याख्या ---     प्रस्तुत पंक्ति में कवि संध्या सुंदरी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आसमान से उतरने वाली संध्या सुंदरी संसार के सभी लोगों को अपने अंग में सुला कर शक्ति प्रदान करती हैं। संध्या सुंदरी अपने मादक प्रभाव से थके हुए प्राणियों को नींद के आगोश में पहुंचा देती है व्यक्ति सारा दिन अपने कार्य से थककर शाम के समय संध्या सुंदरी के मादक प्रभाव से नींद के आगोश में सो कर अपने थकान को मिटाता है। इसे देखकर ऐसा लगता है जैसे संध्या सुंदरी ने मदिरा की एक नदी ही प्रभावित कर दी है तथा वह बड़े प्रेम से प्रत्येक प्राणी को मस्ती से भरा एक प्याला पिला रही है।

4) सप्रसंग आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए --

"मैं विवश बंधा हूं 

इस सारे परिवेश से

 मेरी निरंतर लड़ाई है काल और देश से।"

संदर्भ  ---प्रस्तुत पंक्ति प्रयोगवादी कवि 'गिरिजाकुमार माथुर' द्वारा रचित "समय के ढेर पर "से शीर्षक से ली गई है ।"समय के ढेर पर "कविता गिरिजाकुमार माथुर की कविता संग्रह "साक्षी रहे वर्तमान "मे संकलित है। 

व्याख्या ------प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने अपने जीवन को बेकार और असमर्थ महसूस करता है वह चाह कर भी समय के इस  परिस्थिति से बाहर नहीं निकल पा रहा है। वह समय के एक प्रतिबिंब में अपने जीवन को विवशऔर लाचार महसूस करता है ,लेकिन कवि के अंदर अभी भी जीने की आशा व्याप्त है और लगातार अपने इस परिवेश से लड़ने की कोशिश करता है कि किसी भी तरह और लड़कर इस परिवेश से बाहर निकल सके।

5 ) सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

अ) 'ये लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और  करते क्या है

सप्रसंग व्याख्या --प्रस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी नशा से ली गई है। इस कहानी के माध्यम से कवि जमी़दार प्रथा पर कटाक्ष करते हुए यह बतलाते हैं कि मनुष्य के अंदर कथनी और करनी में फर्क होता है'।

    प्रस्तुत पंक्ति उस वक्त कही गई है जब ठाकुर जी महात्मा गांधी का परम भक्त था।वह वीर को महात्मा गांधी का चेला समझकर बड़ा लिहाज करता था ।एक दिन वह वीर को अकेले देख कर उसके पास गया और हाथ जोड़कर पूछा कि आप तो गांधी के चेले हैं। लोग कहते हैं कि" यहां सूराज हो जाएगा तो जमीदार नहीं रहेंगे "तब वीर ने कहा कि जमी़दार की आवश्यकता ही क्या है यह तो गरीबों का खून चूसने और अत्याचार करने के सिवा और क्या करते हैं।

 ब)   'दोनों ने अपने आसन बदले'

सप्रसंग व्याख्या पंक हमारी पाठ्यपुस्तक साहित्य संचयन कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से ली गई है जिसके कभी गजानन माधव मुक्तिबोध है।

---यहां दोनों शब्द से लेखक गजानन माधव" मुक्तिबोध "और यशराज की ओर संकेत किया गया है ।

जब लेखक ने यशराज को अपनी डायरी दिखाई तो डायरी को लेकर दोनों के बीच बहस होने लगती है ।बहस के समय जब नई कविता के बारे में  यशराज ने कहा कि नई कविता की एक लीक पड़ गई है ,भाव में मानसिक प्रतिक्रिया है जो किसी वस्तु तत्व के प्रति की गई होती है ,वह वस्तु सत्य एवं असत्य दोनों हो सकता है ,तब लेखक ने कहा कि काव्य की प्रक्रिया ज्ञानात्मक प्रक्रिया नहीं है ,इसके उत्तर में यशराज ने कहा कि ज्ञान और बोध के आधार पर ही भावना की इमारत खड़ी की जा सकती है ।यदि ज्ञान और बोध की बुनियाद गलत हुई तो भावनाओं की इमारत भी बेकार और बेजान हो जाती है। उसका प्रभाव काव्य शिल्प पर भी होता है ,यदि लेखक वस्तु के प्रति सही-सही मानसिक प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर पाता है तो प्रतिक्रिया में तत्व का अभाव दिखाई देता है ।यह सुनकर मुक्तिबोध ने कहा कि यदि इस परिभाषा को मान लिया जाए तो काव्य क्षेत्र में एक दंगा समझ जाएगा तुम जिस वस्तु मुल्क सत्य की बात करते हो वह काव्य की भाव सत्य से अलग है। इस बात पर दोनों की बहस चलती है तथा बाद में दोनों की बहस के लिए दोनों ने नए विषय की नए विषय की खोज में लग जाते हैं।


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