सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी का जन्म 7 मार्च सन 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला अंतर्गत कसया गांव में हुआ था ।1929 में बीएससी तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने स्वाध्याय से अंग्रेजी और हिंदी साहित्य का अध्ययन किया ।कुछ दिन तक जोधपुर विश्वविद्यालय में भी कार्यरत रहे। इनका जीवन यायावरी तथा क्रांतिकारी था ।यह सांस्कृतिक कार्यों के लिए अमेरिका भी गए। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी दिनमान ,प्रतीक और दैनिक नवप्रभात टाइम्स मे संपादक के पद पर कार्य किया।
तार सप्तक, दूसरा सप्तक ,तीसरा सप्तक और रूपांतर इनके द्वारा संपादित काव्य संकलन है । यहीं से इनकी काव्य यात्रा शुरू होती हैं। यह प्रयोगवाद और नई कविता के विशिष्ट कवि हैं । इन्होंने भग्न दूत और चिंता नामक छायावादी कविताएं लिखी। इनका स्वर अहं से लेकर समाज तक, प्रेम से लेकर दर्शन तक ,प्राचीन गंध से लेकर आधुनिक चेतना तक, यांत्रिक सभ्यता से लेकर मानव परिवेश तक, यातना बोध से लेकर विरोध की ललकार तक ,मानव शरीर से लेकर प्रकृतिक सौंदर्य तक फैला हुआ है। इनके काव्यों में कहीं-कहीं इनके गहन संवेदना का दर्शन होता है तो कहीं केवल बौद्धिकता का ही दर्शन होता है। इनकी बौद्धिक संवेदना कहीं-कहीं इनकी संवेदना को नियंत्रित करती दिखाई पड़ती है तो कहीं कहीं व्यंग के रूप में व्यक्त करती है । हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की छोटी-छोटी कविताओं में भी सौंदर्य और भाव दृष्टि की विशेषता मिलती है चाहे वह कविताएं व्यंग सौंदर्य या रूप अभिव्यक्ति की क्यों ना हो--
बह चुकी हवाएं चैत की
कट गई पूरे हमारे खेत की
कोठरी में लौ बढा़कर दीप की
गिन रहा होगा महाजन खेत की।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने मानव को सदैव समाज के संदर्भ में देखा है वह समाज का अंग है, और समाज द्वारा ही निर्मित है। उनके काव्य में मध्यमवर्गीय दर्द का बोध मिलता है।
भाषा शैली ---सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की भाषा शैली सुबोध सुबोध है ।इनके गद्ध की भाषा बोलचाल की भाषा है जिसमें तद्भव शब्दों का स्वच्छ प्रयोग हुआ है। इनकी भाषा शैली ने नए मापदंड स्थापित किए हैं ।इनकी शैली में इनका चिंतन -पथ पर्याप्त समृद्ध और मौलिक है।
रचनाएं -- चिंता ,हरी घास हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्रधनु रौंदे हुए ,आंगन के पार द्वार ,सुनहले शैवाल, कितनी नावों से कितनी बार ,सागर मुद्रा, महावृक्ष के नीचे आदि काव्य संग्रह है।
त्रिपथगा, परंपरा, कोठरी की बात ,शरणार्थी ,जबदोल, यह तेरे प्रतिरूप ,अमर वल्लरी ,छोड़ा हुआ रास्ता ,लौटती पगडंडी आदि इनकी कहानी संग्रह है ।
"उत्तर प्रियदशी" इनका नाटक
त्रिशंकु ,सबरंग, हिंदी साहित्य एक आधुनिक परिचय ,आलवाल, लिखी कागज कोरे ,जोग लिखी, स्त्रोत और सेतु, व्यक्ति और व्यवस्था, अपरोक्ष, संस्कृति की चेतना ,केंद्र और परिधि ,छाया का जंगल आदि इनकी निबंध ।
आधुनिक हिंदी साहित्य ,तार सप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक, चौथा सप्तक, नए एकांकी ,नए साहित्य स्त्रषटा आदि इनकी डायरी है।
अलंकार -- सच्चिदानंद हीरानंद बांधना गए जी ने पुराने अलंकारों का नए रूप में प्रयोग किया। मानकीकरण, विशेषण विपयर्य का नवीन अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है। पुराने उपमान और प्रतीकों के संबंध में वे कहते हैं ।
ये उपमान मेले हो गए
देवता इन प्रतीकों से कर गए हैं कुच
कभी बासन अधिक घिसने से मूलम्मा छूट जाता है।
छन्द --- इन्होंने अपनी कविताओं में रोला, शिखरी, मदाक्रान्ता, आदि परंपरागत छन्दो का प्रयोग किया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की रचनाओं में परंपरा से हटकर कुछ नहीं विशेषताएं दिखाई देती है ।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
एक नजर में
जन्म----- 7 मार्च 1911
मृत्यु---- 4 अप्रैल 1987
नागरिकता --ब्रिटिश राज भारत
शिक्षा --बीएससी मद्रास विश्वविद्यालय
सामाजिक परिचय--- लेखक कवि पत्रकार उपन्यासकार क्रांतिकारी
प्रसिद्धि करण ---शेखर एक जीवनी ,आंगन के पार द्वार, तार सप्तक, त्रिशंकु
धार्मिक मान्यता--- सनातन धर्म
पुरस्कार ---ज्ञानपीठ पुरस्कार।
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