कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी निबंध के लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध की है गजानन माधव मुक्तिबोध ने इस लेख को
निबंध का लेखन कार्य का प्रारंभ भी बहस और बीच बचाव से शुरू होता है लेखक ने स्वयं की एक व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर एक डायरी लिखी है वह भी वसुधा पत्रिका के अंक के लिए . यह हम सभी जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति जब अपने को सचेत अवस्था में ले जाकर समाज की अच्छाइयों और बुराइयों को देखते हुए स्वयं का आकलन करता है तो वह जाहिर तौर पर स्वयं के लिए सही लिखता है और ईमानदारी और निष्ठा पूर्वक से लिखता है यही काम स्वयं लेखक ने भी हरिशंकर परसाई जी के बार-बार पत्र आगरा पर किया था पर लेखक के बगल वाली गली में यशराज जी जो पूरा का पूरा साइंस की तरह है वह कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी अर्थात कला और साहित्य के व्यक्ति को कुछ नहीं समझते हो लेखक के इस ईमानदारी पूर्ण ईमानदारी पुनीत कार्य को एकदम से जाली और फ्रॉड ठहराते हैं इसका परिणाम यह हुआ कि लेखक के ऊपर देते इस वज्रपात सा हो गया था वह अपनी मेहनत से बनाई गई डायर यहीं धूल राम और बालू का ढेर सारी नहीं होने देना चाहता है लेखक कहता है कि उसने तनिक भी गुस्सा नहीं आया किंतु अपने स्वभाव को अंतर रखता है और अपनी परंपरा से बौद्ध संस्कृति को हमेशा बनाए रखने का कुशल नेतृत्व जानता है इसलिए उसने अब तक बुद्धि से ही स्वयं को संचालित किया है उसके लिए एक लंबी प्रक्रिया के समान है जो चल रही है लेखक अपने जीवन संबंधी अवधारणा है कि वह एक महाविद्यालय विश्वविद्यालय नहीं है जाती है.
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