Hindi 12

 समय के ढेर पर 

                  गिरिजाकुमार माथुर

जन्म :-1919 अशोकनगर मध्य प्रदेश

शिक्षा:- लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी 

 कार्य :- वकालत दिल्ली सचिवालय में कार्यरत ऑल इंडिया रेडियो में कुछ दिनों तक कार्य

रचनाएं :- मंजरी नाथ और निर्माण धूप के धान जिला प्रमुख चमकीले इत्यादि काव्य संग्रह

भाषा:- संस्कृत हिंदी उर्दू और दैनिक बोलचाल की भाषा

 मृत्यु:- 1994

                              कविता 

व्यर्थ  गया है जीवन

 इतने सारे वर्षों में 

सिर्फ असमर्थता का

 ढेर ढेर कूड़ा ही इकट्ठा हुआ

 अधूरा रुका है वक्त

 और यह देह सिर्फ आधी सांस लेती है 

   संदर्भ  :- प्रस्तुत पंक्ति प्रयोगवादी कवि गिरिजाकुमार माथुर द्वारा रचित कविता समय के ढेर पर नामक पुस्तक से ली गई है जो साथी रहे वर्तमान नामक काव्य संग्रह में संकलित है तथा हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी पाठ संचयन में भी संकलित है ।

प्रसंग--:यह कविता द्वितीय विश्वयुद्ध  की परिस्थितियों के बाद की लिखी हुई कविता है ।युद्ध की विभीषिकाओं के कारण मानव मूल्यों का जो विघटन हुआ है जिसके कारण व्यक्ति में कुछ ना कर पाने की असमर्थता व्याप्त हो गई है ,उसी की ओर संकेत करके इस कविता की रचना की गई है ।

व्याख्या:-  कभी कहता है कि मैंने ना जाने कितने साल अपने जीवन के व्यर्थ गवाह दिए हैं अपनी  कुंठा ,निराशा ,  जीवन में कुछ ना कर पाने के कारण केवल आसपास असमर्थता का कूड़ा एकत्रित किया है ,अपेक्षित शक्ति ना रहने के कारण जिससे कि मेरा समय गति हीन हो गया अर्थात रुक गया और मैं अपने शक्ति हीनता की वजह से सांस सांस भी ठीक से नहीं ले पा रहा हूं अर्थात अधिक बेचैनी महसूस कर रहा हूं इस असमर्थता ने कहीं ना कहीं मेरे अंदर गहरी पैठ बना ली है।

काव्यगत सौंदर्य :-*इन पंक्तियों में माथुर जी ने मानव जीवन की भय और कुंठा के कारण जीवन में कुछ ना कर पाने की असमर्थता का चित्रण किया है।

 *निराशावादी दृष्टिकोण और जीवन के प्रति नाश्ता का स्वर इन पंक्तियों में मुखरित हो उठा है ।

*भाषा शुद्ध खड़ी बोली है ।

*'ढेर -ढेर' शब्द में अनुप्रास अलंकार है।

हर सेकंड को टोककर 

जोर से डंक मारती है

 बड़ी -बड़ी सुइयों वाली घड़ियाँ

 निहाई पर चलते हुए 

रक्त बूँदो के रिबन 

हर बूंद पर पड़ता है

 पलों का हथौड़ा

 ठन होती है घड़ी की आवाज

 कुचल जाता है एक और मिनट 

  मुझे डर लगता है

 हर तेज घडी़ की आवाज से 

सन्नाटे में 

एक सेकंड और दिन चीखे मरता है 

मेरी उम्र पर लगातार कोई एक छाया पाँव धरता है

मैं विवश बधाँ हूं 

इस सारे परिवेश से 

मेरी निरंतर लड़ाई है 

काल और देश से 

कंकाल चेहरे वालों 

चारों तरफ

 डायल ही डायल है 

हड्डियों की टक्-ट्क

 और मैंने अपने आसपास

 एक मनमानी अनंतता रोप ली है 

काल की धारा छिपाकर 

एक टूटती देह में कैद की है।



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