हिंदी साहित्य का इतिहास12

 भारतेन्दुकालीन  प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय दीजिए।

:-भारतीय हिंदू के नाम पर आधुनिक हिंदी का प्रथम स्थान कल भारतीय हिंदू युग कहां जाता है हिंदी नवयुग की चेतन को प्रतिष्ठित करने का श्रेय इन्हीं प्राप्त है ।

देशभक्ति की भावना  :-  भारत में अंग्रेजी राज्य स्थापित हो जाने पर उसे कल के कवियों को महान दुख था ।स्वयं भारतीय हिंदू जी से तत्कालीन भारत की दुर्दशा देखी नहीं जाती वह कहते हैंः-  रोबहु सब मिलकै आबहु  भरत भाई 

हां हां भारत दुर्दशा ना देखी जाए।

देशवासियों की पारस्परिक फूट सभी कवियों को खलती थी इसी फुट के कारण उनका देश गुलाम बना फिर भी वह आपसी फूट त्यागते नहीं ।भारतीय हिंदू जी कहते हैं

बेर फुट ही सो भयो सब भारत को नाश

 ताबहुँ ना छाड़त  यही ,सब बंधें मोह के फांस।

समाज सुधार की भावना:- अंग्रेजी राज्य की स्थापना और अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार से समाज में अनेक दोष आ गए थे सामाजिक को प्रथाओं को दूर करने के लिए प्रयत्न होने लगे ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी संस्थाएं सामने आई भारतीय हिंदू जी ने समाज की करूं स्थिति पर प्रकाश डाला उन्होंने जातियों के पारस्परिक भेदभाव छुआछूत बहु विवाह बाल विवाह वृद्धि विवाह अनमेल विवाह मद्यपान आदि का घोर विरोध किया उन्होंने और उनके सहयोगियों ने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह का समर्थन किया तथा पारस्परिक सामाजिक असमानता की भी निंदा की

जाति अनेकन करी नीच अरु उच्च बनायो ।

खान-पान संबंध, सबन सो  बरखा छुडायो।

प्राचीनता तथा नवीनता का सामनवा :- भारतीय हिंदू योग के काव्य की तीसरी विशेषता प्राचीन और नवीन के मध्य संबंध की भावना नवीन आदर्श से मुक्त तो इस युग की कविता है ही साथ ही इसमें प्राचीन भक्ति और श्रृंगार की परंपराओं की को भी सफलता के साथ अपनाया गया है भारतीय हिंदू और उनके सहयोगियों ने भक्ति और श्रृंगार संबंधी सैकड़ो पर लिख डालें। रस से सराबोर भक्ति और भारतीय हिंदू का एक पद इस प्रकार है :-

ब्रज के लता पता मोहि  कीजै

 गोपी पद पंकज पावन की रस जामै  सिर भिजें।

हास्य और व्यंग्य का पुट:- भारतीय हिंदू युग की रचनाएं हास्य व्यंग के पट के लिए प्रसिद्ध है ।इसके पहले इधर हिंदी कवियों का ध्यान कभी नहीं गया था ।भारतीय हिंदू ,प्रताप नारायण मिश्रा और प्रेमधन जी अपने  हास्य और व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध है ।भारतीय हिंदू और मिश्रा जी के इस प्रकार के वर्णन अधिक शिस्ट  और मार्मिक बन पड़े हैं। मिश्रा जी अपनी पत्रिका हेतु चंदा हास्य पूर्ण ढंग से मांगते थे।

 आठ मार्च बीते जजमान, अब तो करो दक्षिणा दान ,हर गंगा हंसी खुशी से रुपया देव , दूध पुत्र सब हमसे ले ,हर गंगा।।

युग की भाषा :- पहले से चली आ रही ब्रजभाषा का बहिष्कार किया गया वह सहज सौंदर्य के लिए जान सुलभ बनाई गई पद की भाषा ब्रजभाषा ही बनी रही खड़ी बोल बोली को भी पद की भाषा में अपने का प्रयास किया गया।

छंद:- परंपरा से आते हुए संडे को भारतीय हिंदू युग में अपनाया गया कविता रोल दोहा आदि चंद इस युग के प्रिय छंद है सवैया और रोला छंद इस युग के कवियों को विशेष प्रिय है जैन साहित्य के निर्माण के लिए भारतीय हिंदू ने ठुमरी कजरी बिरहा गजल होली चैती लावणी आदि छंदों को अपने पर बल दिया।

इस प्रकार सर्वसाधारण के मध्य शहर सुलभ हिंदी के प्रचार का श्रेय भारतीय हिंदू युग को जाता है 


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