Class 12 Hindi kabir ke pad

गुरु प्रेम और जगत के संदर्भ में वर्णित कबीर के भाव को स्पष्ट कीजिए !
उतर:- कबीर दास जी पढ़े-लिखे नहीं थे किंतु उन्होंने संसार के सत्य के अन्वेषण के लिए अपने ही जीवन को प्रयोगशाला के रूप में ग्रहण किया ।उन्होंने अपने दोहे के माध्यम से अंतर जगत के सत्य का उद्घाटन किया ।कबीर दास ने अपने जीवन और काव्य दोनों में सद्गुरु को बहुत अधिक महत्व दिया है। उनका कथन है कि सतगुरु तभी प्राप्त हो सकता है जब ईश्वर की कृपा होती है। इनको कैसे बुलाया जा सकता है। उन्होंने लिखा है :-
"ज्ञान प्रकाश का गुरु मिलाया ,सो जिनी बिसरि जाए।
 जब गोविंद कृपा करी,तब गुरु में लिया आए ।"
कबीर दास जी का यह मानना है कि यदि सच्ची गुरु को प्राप्त करना है तो निस्वार्थ भाव से गुरु के प्रति समर्पित होना चाहिए। कोई भी साधना तभी सफल होती है जब वास्तविक ज्ञानी रूप गुरु मिले और सच्चा निष्ठवंशी से मिले समाज में अधिकांश गुरु इसी दांव में लगे रहते हैं कि उनके यहां शिष्य की मंडली एकत्र हो जाए और शिष्याओं में रहते हैं कि किसी सुप्रसिद्ध गुरु का शिष्य कहला कर महत्व प्राप्त कर ले ।परंतु सच्चे गुरुवार शिष्य के अभाव में साधना और भक्ति प्राप्त नहीं हो पाती है । शिष्य की मार्गदर्शन के लिए गुरु का ज्ञानी होना आवश्यक है तथा कबीर दास जी कहते हैं कि "
जाकर गुरु आंध्ला  चेला  खड़ा निरंध ।
अंधे अंधा ठेलिया ,दूनू कूप पडंत ।
कबीर दास ने ईश्वर के प्रति के लिए प्रेम को सबसे सरल मार्ग बतलाया है ।उनका कहना है कि जब मनुष्य के हृदय में अभिमान होता है तो भगवान उनसे दूर रहते हैं और जब मनुष्य के हृदय में भगवान निवास करते हैं तो मनुष्य के मन का अभिमान दूर हो जाता है ।प्रेम का रास्ता इतना सकरा है कि  उसमें अभिमान और प्रेम एक साथ नहीं रह सकता ।अतः मनुष्य के मन में जब तक अहंकार का वास होता है भगवान वहां नहीं बस सकते ।इस संबंध में वह लिखते हैं :-
" जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं ना ही
 प्रेम गली अति सकरी  जामे  दोओ ना समाये।
आगे कबीर दास जी जगत के संबंध में अपने विचार प्रकट करते हैं कि इस सृष्टि में ब्रह्मास्त्र व्याप्त है। यह सृष्टि इस ब्रह्मा से है इसे कबीर ने बड़े ही रोचक शब्दों में उदाहरण देकर बताया है यदि समुद्र के जल में घड़ा को डुबो दिया जाए तो घड़ी में जल भर जाएगा और तब घड़े में भी जल होगा और घडे़ के बाहर की जल होगा। परंतु यदि घडे़ को फोड़ दिया जाए तो घड़ी का जल और समुद्र का जल एक हो जाएगा। ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि रूपी घड़े के भीतर और बाहर परमात्मा विद्वान है। शरीर रूपी घड़ा नष्ट होता है वैसे ही जीवात्मा परमात्मा एक हो जाते हैं।  कबीर के शब्दों में है कि:-
 जल में कुंभ, कुंभ में जल है ,बाहर भीतर पानी ।
फूटा कुंभ जल जल ही  समाना, यह तन कथौ   ज्ञानी।।

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