"समय के देर पर " कक्षा 12
"समय के ढेर पर" शीर्षक कविता का सारांश लिखिए।
अथवा
"समय के ढेर पर "कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए
उतर :-" समय के ढेर पर" कविता" साक्षी रहे वर्तमान" शीर्षक काव्य संग्रह से ली गई है जिसके कई गिरजा कुमार माथुर जी हैं। प्रस्तुत कविता द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियों की बात की लिखी हुई कविता है युद्ध की विशेषताओं के कारण मानव का मूल्य का विघटन ,सामाजिक विषमताओं का क्षय, अकेलापन ,कुंठा ,जीवन में कुछ ना कर पाने की असमर्थता आदि निराशा के स्वर व्याप्त दिखाई पड़ता है ।'समय के ढेर पर' कविता अस्तित्ववाद से क्षणवाद जीवन दर्शन को अंगीकार करता है।
घड़ी की सुइयों को प्रतीक बनाकर अपने व्यर्थ होते समय को देखकर कभी व्याकुल हो रहा है ।कवि का भय और कुंठा इतनी बढ़ गई है कि उसे घड़ी की आवाज से डर लगता है। कवि कहता है कि मैं अपने निष्क्रियता और शिथिलता के कारण अपने जीवन के कुछ वर्ष गंवा दिए लेकिन अब इसके अंदर जिजीविषा जागृत हो चुकी है ।वह अपने उसे परिवेश से लड़ने की कोशिश कर रहा है और कुछ हद तक वह अपने इस कार्य में सफल भी हो चुका है ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्तुत कविता आज की पूंजीवादी समय में मानव जीवन का घड़ी या वक्त की यांत्रिक संबंध था का प्रतिरोध करती है। समय के कम से कदम मिलाकर चलने में व्यक्ति की व्यक्तित्व और चिंता की रक्षा हो सकती है। बशर्ते यह है कि काल और व्यक्ति का संबंध जड़ यांत्रिकता से मुक्त हो।। कल के स्वाभाविक प्रवाह के साथ हमारे संबंध की पैरोंकर है यह कविता :-'समय की ढेर पर'
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