अवकाशवाली सभ्यता कक्षा 12

 अवकाश वाली सभ्यता में कवि ने किन-किन भाव को व्यक्त किया है

अथवा 

अवकाश वाली सभ्यता कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए

उतर:-अवकाशवाली सभ्यता छायावादी कवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वारा लिखित कविता है।

युद्ध के बाद या युद्ध के दौरान शांति की समस्या से वह भी पीड़ित थे ।प्रस्तुत कविता दिनकर जी के द्वारा युद्ध और शांति की समस्या से प्रेरित होकर लिखिए एक रचना है। *कवि ने मनुष्य के द्वारा जरूरत के नाम पर किए गए अनेक आविष्कार किया ।उस आविष्कार का मनुष्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है या आने वाला समय पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है इसका स्पष्ट विवरण इस कविता में दिया गया है ।मनुष्य को विज्ञान ने आलसी अकर्मठ बना दिया है जो कवि की चिंता का प्रमुख कारण है। वह कहते हैं कि मैं मैं अंधकार से प्रकाश की ओर देखता हूं और उसकी रोशनी मुझे भविष्य तक लेकर जाती है। आगे वह कहते हैं कि दुनिया चाहे लाख बदल जाए लेकिन भारत हमेशा भारत बना रहेगा ।भारतवासी भारतेन्दू की नजर में बैलगाड़ी के समान ही है। युद्ध की वजह से जो ज्योति बुझी जा रही है वही ज्योति भारत में जलेगी और यांत्रिकता बाद के फलस्वरूप थकी हुई धरती उस नयी रोशनी में चलेगी।

कवि कहते हैं कि मानवता के आगामी मूल्य पीठ साबरमती पुडुचेरी और तिरुवनमलाई तथा दक्षिणेश्वर होंगे। वह युद्धपुरांत शांति की कामना करते हुए कहते हैं कि जब दुनिया युद्ध से अस्त्रों से झुलसने लगेगी तो शीतलता की धारा भारत से निकलेगी ।मनुष्य अत्यधिक सुखों के लाभ से ग्रस्त होने के कारण एक एक पर एक आविष्कार किया जा रहा है यही लोग उसे मारेगा क्योंकि आविष्कारों के कारण मशीनीकरण तथा औद्योगीकरण का विकास होता जा रहा है जिससे कि मनुष्य के पास खाने-पीने की सुविधा तो रहेगी लेकिन वह अवकाश से ग्रस्त हो जाएगा तथा उसे उसे अगर किसी चीज की कमी होगी तो वह होगा काम का। दिनकर जी जी कहते हैं कि गांधी जी कहते थे की अवकाश बुरा नहीं है लेकिन मनुष्य को चाहिए कि बिना मतलब का अवकाश न ले क्योंकि अवकाश से मनुष्य के आत्मा उगने लगते हैं उससे बेहतर है कि मनुष्य अपने को काम में उलझाए रखें तथा थकावट के बाद वह अपने शरीर को आराम दे । साथी साथ वह कहते हैं कि सारा भार विज्ञान पर डालना गलत है जिसको एक न एक दिन दुनिया स्वीकार करेगी ।

  एक अन्य कविता" चांद और कवि" में दिनकर जी कहते हैं कि मनुष्य अपनी समस्याएं खुद बनाकर उसमें उलझा रहता है 

"उलझनें अपनी बनाकर आप ही  फँसता

और फिर बेचैन हो जाता ना सोता है"

इसलिए प्रसिद्ध कविता में दिनकर जिए कहते हैं कि भौतिकवादी होकर इंसान विकार हो गया है विज्ञान ने अत्यधिक सुख प्रदान करके उसे अकर्मक बना दिया है जिसके परिणाम स्वरूप और स्वयं का विनाश कर रहा है



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