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 भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासी एवं दलित संप्रदायों के आंदोलन का विवरण दीजिए!

Ans:- भारत में औपनिवेशिक  शासन काल में सबसे खराब अवस्था आदिवासियों और दलितों की थी ।ब्रिटिश सरकार एवं मध्यम वर्गीय समाज एवं महाजनों के शोषण के अतिरिक्त समाज के उच्च वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति इन्हें दृष्टि से देखा था। निम्न वर्गों में संथाल, कोल ,मुंडा आदि लोग ने सरकार जमींदार और महाजनों के शोषण के विरुद्ध में आंदोलन किया ।बाद के काल में आर्थिक शोषण एवं सामाजिक अत्याचार के विरुद्ध दलित ने भी प्रतिरोध करना शुरू किया। परिजन मेहर आदि जाति के दलितों ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में आंदोलन किया बंगाल में दलितों ने आंदोलन चलाया उसमें नमः शुद्र, राजवंशी आदि आते थे।

       आदिवासियों के जीवन पर औपनिवेशिक प्रभाव अपनी बेसिक नीति ने उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया जिसका वर्णन निम्नलिखित है :-

*प्रशासनिक सुधार के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने आदिवासियों में घुसपैठ की ।सरकार ने उनके हाथ से वन भूमि का अधिकार छीनकर उनको प्रभावित किया।

* ब्रिटिश सरकार ने वनों के स्वामित्व और उनके उपयोग के संबंध में कानून बनाया उसने आदिवासियों के परंपरागत जीवन में एकाएक परिवर्तन ला दिया ।सरकारी एजेंसी को स्वीकृति के बिना उसके वनों के उपयोग पर रोक लगा दी गई ।आदिवासी वनों के उत्पाद को अपनी संपत्ति समझते थे अब यदि सरकारी स्वीकृति के बिना वह उसका उपयोग करते थे तो उन पर जुर्माना किया जाता था और उन्हें जेल में बंद कर दिया जाता था।

** सबसे बड़ा परिवर्तन का दौर तब चला जब इसी मशीनरींयों ने उनका धर्म परिवर्तन करना शुरू किया मशीनरी उनके भोजन नौकरी दवा की लालच देकर उनका धर्म संस्कृति परिवर्तित करने को बंदे करती थी कुछ लोग लालच में स्वयं ही साई धर्म स्वीकार करते थे।।

आदिवासियों ने अपने को वर्ग के आधार पर संगठित कर जाती आधार पर जैसे संथाल ,कोल, मुंडा के रूप में संगठित किया था। 19वीं शताब्दी के पूर्वज में आदिवासियों के अनेक विद्रोह हुए उनके प्रधान विद्रोह थे। बांकुरा और मेदिनीपुर जिले का चुआड़ विद्रोह ,भील विद्रोह ,खासिया विद्रोह ,कोल विद्रोह, गौर विद्रोह, संथाल विद्रोह लोग विद्रोह इत्यादि।

इन विद्रोह में संतान और कल विद्रोह अत्यंत महत्वपूर्ण द संथालों ने बाबा तिलक मांझी के नेतृत्व में सन 1784 ईस्वी में भी एक बार विद्रोह किया था जिस कंपनी ने दावा दिया था तिलक मां जी को फांसी दे दी गई इसी तरह कोल, गारो, खासिया तथा नागा आदि जनजातीय ने भी विद्रोह किया लेकिन सरकार ने सेवा के बल पर उनका दमन कर दिया और यह विद्रोह अपना अस्तित्व खो दिया।

दलित आंदोलन:- परंपरागत वर्ण विभाजित हिंदू समाज में दलित पांचवें वर्ग में आते थे जिन्हें "अछूत "कहा जाता था। अन्य चार वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र द दिल्ली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दल से हुई है जिसका अर्थ "दमन "है।

* दलित लोग सदियों से सटे और प्रताड़ित लोग थे हिंदू समाज ने इन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा यह प्रतिबंध थे उन्हें अन्य जातियों के लोगों के साथ भोजन करने की स्वीकृति नहीं थी उनके गांव के मंदिर में प्रवेश की मनाई थी विद्यालय में दलित विद्यार्थी अन्य जाति के विद्यार्थियों के साथ कक्षा में नहीं बैठ सकता था इतने इसके बैठने की अलग व्यवस्था की जाती थी दलित सार्वजनिक कुआं तालाबों का उपयोग नहीं कर सकते थे इसके अतिरिक्त उनके सामने अंकुरित बंधन थे दक्षिण भारत में तो उनकी परछाई को छूना पाप समझा जाता था तथा उन्हें सभी रास्तों पर चलने की मनाई थी एक गांव के वहां रहते थे जब गांव में प्रवेश करते थे तो उन्हें  आवाज लकर अन्य लोगों को बताना पड़ता था कि वह आ रहे हैं।

ब्रिटिश शासन के दौरान स्थानीय स्तर पर होने वाले कुछ प्रमुख दलित आंदोलन इस प्रकार है सतनामी आंदोलन। महार आंदोलन ,नामशुद्र आंदोलन ,नाडार,झझवा, जागरण आंदोलन पंजाब का आदि -धर्म आंदोलन।

2)भारत सरकार अधिनियम 1919 की विशेषताओं तथा त्रुटिय की चर्चा कीजिए।

--- सन 1919 के कानून द्वारा एक तरफ दो ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास किया तो दूसरी तरफ सरकार ने भारत के लोगों के ऊपर दमन आत्मक कार्रवाई प्रारंभ की प्रथम विश्व युद्ध काल में सही प्रकार के राजनीतिक आंदोलन को दबाने के लिए भारत सुरक्षा कानून लागू किया गया डॉक्टर सुमित सरकार के अनुसार भारत में एक विशिष्ट क्रांतिकारी स्थिति विकसित हुई।

मूल्य वृद्धि सुख बेरोजगारी काल में जन आंदोलन की पृष्ठभूमि को तैयार कर दिया तुर्की के प्रति अंग्रेजों की नीति ने मुस्लिम ने भी मुसलमान को आकर्षित कर दिया दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार हुआ इन कानून ने भारतीय को संतुष्ट कर दिया ।भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों प्रारंभ हो गई अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों को दबाने के लिए दमनकारी कानून बनाने के लिए इंग्लैंड के एक जज कर सिडनी रॉयल की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया ।इस कमेटी के पांच सदस्य थे।

रौलेट कमिटी की सिफारिश के आधार पर 1919 इसी में केंद्रीय विधायिका में सभी प्रकार के सरकार विरोधी आंदोलन को उतारने के लिए दो बिल प्रस्तुत किए गए नंबर एक सरकार विरोधी कोई भी कार्य या प्रचार राजद्रोह समझ जाएगा और सं संदेश पद व्यक्ति को हेवियस्ट कॉटेज के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया जाएगा तथा उसके मुकदमा चलाने का कोई अधिकार न होग होगा सरकार बिना किसी वारंट घर की तरह की ले सकती थी अभियोग पक्ष को उच्च को में जाने का कोई अधिकार नहीं होगा केंद्रीय विधायक का के भारतीय प्रतिनिधियों के संयुक्त विरोध के बाद भी यह कानून मार्च 1919 ई को पारित किया गया जिसे रौलेट एक्ट कहा जाता है।।


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