Class 12 भारत में न्यायपालिका
Q:- भारत में लोग अदालत के संगठन एवं कार्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए .अथव
Ans :-लोक अदालत की स्थापना लीगल सर्विस अथॉरिटीज एक्ट 1987 के पारित होने के बाद हुआ लोक अदालत एक आंदोलन है ।
इसका मुख्य उद्देश्य :-*अनेक अदालत में बहुत दिनों से लंबित मुकदमों को निपटाकर अदालतों के बोझ को कम करना।
* जिन लोगों के मुकदमे लंबे समय से पड़े हुए हैं उनको राहत देना।
* कम खर्चे में मुकदमों को निपटाना अदालत के बाहर मुकदमों को निपटने का प्रयास करना।
लोक अदालत का गठन: लोक अदालत का गठन कार्यरत या अवकाश प्राप्त न्यायिक आधिकारिक तथा वैद्य सेवा कानून के द्वारा नियुक्त व्यक्ति के द्वारा होता है ।यह व्यक्ति न्याय व्यवस्था को तथा पारदर्शी बनाने में मदद करते हैं ।सरकारी मंत्री या विभागों के लिए निर्मित लोक अदालत में भी सदस्यों की नियुक्ति इसी आधार पर होती है।
लोग अदालत का स्वभाव एवं न्याय क्षेत्र :-लीगल सर्विस अथॉरिटीज एक्ट के अनुसार लोक अदालत को दीवानी अदालत का दर्जा प्राप्त है इसके द्वारा जो निर्णय किए जाते हैं वह अंतिम होते हैं ,और इसके निर्णय के विरोध किसी अदालत में अपील नहीं की जा सकती ।लोक अदालत्ते विभिन्न प्रकार के विवादों को निपटाने क का कार्य करती है- जैसे नौकरी संबंधी, मोटर दुर्घटना कुछ फौजदारी मुकदमे ।मंत्री एवं सरकारी विभागों के लिए स्थापित लोक अदालत सरकार एवं उसके कर्मचारियों के विवादों को सुलझाने का काम भी करती है। सन 1999 ईस्वी में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सभी मंत्रियों एवं विभागों को प्रत्येक विभाग में लोग अदालत के गठन का आदेश दिया।
लोक अदालत की कार्य प्रणाली:- जब वादी और प्रतिवादी न्यायालय के चक्कर लगाते लगाते तंग कर थक जाते हैं तब तथा लंबे समय के अंतराल में भी न्याय पाने की उन्हें कोई उम्मीद नहीं रहती तब सिद्ध एवं सस्ता नया पाने के उद्देश्य से वह लोग अदालत का सहारा लेते हैं। लोक अदालत सोहार्रद के आधार पर वादी और प्रतिवादी के बीच समझौता करता है लोक अदालत अपनी न्यायिक प्रक्रिया दीवानी अदालत की तरह कार्य प्रणाली के समान शुरू करती है।
लोक अदालतो का महत्व:- लोक अदालत के कार्यों के देश में प्रत्येक भाग में प्रशंसा हुई लोक अदालत के महत्व को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है:-
* लोक अदालत वादी- प्रतिवादी के बीच समझौता करने का प्रयत्न करती है ।यहां दोनों पक्ष यह समस्या है कि उनके साथ न्याय हुआ है लोक अदालत सोहादृ का वातावरण तैयार करती है।
* लोक अदालत शीघ्र एवं सस्ता न्याय प्रदान करती है यहां कोई भी व्यक्ति अपने मामले को सादे प्रार्थना पत्र या फॉर्म भरकर लोग अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है ।इसमें किसी पक्ष को किसी प्रकार का खर्च नहीं करना होता है प्रदान करने में बहुत सहायक करती है।
* लोक अदालत के फैसले पर दोनों पक्षो की सहमति होती है इसके निर्णय वाद्य कार्य और अंतिम होते हैं इसके निर्णय के विरुद्ध किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकती इसमें व्यक्तियों को न्यायालय का चक्कर काटने से मुक्ति मिल जाती है।
* लोक अदालत उन विवादों के विषय में भी निर्णय पास कर सकती है जिनके संबंध में किसी भी अदालत में मुकदमा न चल रहा हो मुकदमे के पहले कोई भी पांच लोग अदालत के सामने अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रार्थना कर सकता है गरीब अमीर सभी को अपने मुकदमे के संबंध में पूर्ण सुविधा प्रदान की गई है।
* लोक अदालत का वर्तमान समय में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि यह न्यायालय के कार्य के बोझ को कम कर देती है जिससे न्यायालयो में भी शीघ्र निर्णय या फैसला लेने का अवसर बढ़ जाता है।
2) उच्च न्यायालय के संगठन एवं क्षेत्राधिकार का वर्णन करें अथवा
भारत के उच्च न्यायालय के संगठन एवं कार्य का वर्णन करें। अथवा
किसी राज्य के उच्च न्यायालय के संगठन तथा कार्यों का वर्णन करें।
Ans:- भारतीय संविधान में कहा गया है कि भारत के प्रत्येक राज्य में एक उच्च न्यायालय होगा लेकिन भारतीय संसद अपने कानून द्वारा दो या दो से अधिक राज्य तथा केंद्र शासित क्षेत्र के लिए संयुक्त उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है ।उदाहरण के तौर पर 1965 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम द्वारा कोलकाता उच्च न्यायालय की का क्षेत्राधिकार अनुमान तथा निकोबार द्वीपसमूह को तक बढ़ा दिया गया था।
उच्च न्यायालय का संगठन भारत के प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीश होते हैं ।अन्य न्यायाधीशों की संख्या संविधान में निश्चित नहीं है ।राष्ट्रपति आवश्यकता अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या घटाई बढ़ा सकते ।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए कुछ योग्यताएं निर्धारित की गई है :-* वह भारत का नागरिक हो ।
*वह भारत राज्य क्षेत्र के अंतर्गत किसी न्याय पद पर रह चुका हो।
* राज्यों के उच्च न्यायालय से वह कम से कम 10 वर्षों तक अधिवक्ता रहे चुका हो ।
*वह 62 वर्ष से कम आयु का हो।
उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार:- सर्वोच्च न्यायालय की भारतीय राज्य के उच्च न्यायालय में भी क्षेत्राधिकार प्राप्त है। उच्च न्यायालय को निम्नलिखित क्षेत्र अधिकार है:-
1) प्रारंभिक क्षेत्राधिकार:- भारत में सभी उच्च न्यायालय को अब प्रारंभिक अधिकार प्राप्त हो गए अब एक निश्चित राशि अथवा ₹2000 की रकम के मुकदमे भी सीधे उच्च न्यायालय में पेश किया जा सकते हैं इसके अलावा वसीयत विवाह विच्छेद विवाह विधि कंपनी कानून न्यायालय के अपमान आदि से संबद्ध मामले की अब सीधे उच्च न्यायालय में पेश किए जाते हैं।
2) अपीलीय क्षेत्राधिकार:- भारत के सभी उच्च न्यायालय को दीवानी और फौजदारी दोनों मामलों में अपील अधिकार प्राप्त है ।दीवानी और फौजदारी मामलों के अलावा उच्च न्यायालय को अन्य विषयों में भी अपने अधिकार है जैसे राजस्व संबंधी सभी मुकदमे आयकर बिक्री कर अथवा उत्तराधिकार भूमि प्रति दिवालियापन टेंटेड और डिजाइन एवं सरंक्षकता के संबंध मुकदमों की अभी भी अपील भी उच्च न्यायालय में की जा सकती है।
3) मूल अधिकारों का संरक्षक :- सर्वोच्च न्यायालय की भारतीय उच्च न्यायालय को भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण अधिकार है भारत का कोई भी उच्च न्यायालय अपने क्षेत्र अधिकार वाले प्रदेश में नागरिकों के मूल अधिकारों के अतिक्रमण की दशा में विभिन्न लिखो से बंदी प्रत्यक्षीकरण परमादेश प्रतिशत इत्यादि जारी कर सकता है।
4)प्रशासकीय अधिकार:- संविधान के अनुच्छेद में 229 के अनुसार उच्च न्यायालय के पदाधिकारी तथा कर्मचारियों की नियुक्ति तथा सेवा के अनुसार के मुख्य न्यायाधीश द्वारा निर्धारित की जाती है ।इसके लिए और राज्यपाल तथा लोक सेवा आयोग से परामर्श लेता है।
५) अभिलेख न्यायालय:- उच्च न्यायालय के अभिलेख न्यायालय भी है इसके अभिलेखों को अन्य न्यायालय में प्रमाण के रूप में पेश किया जा सकता है और उसे समय उसकी वैधानिकता में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है ।
उपयुक्त से स्पष्ट है कि राज्य पालिका के सिर्फ बिंदु पर उच्च न्यायालय है और उसे काफी व्यापक अधिकार दिए गए हैं उसे कुछ अधिकार तो सर्वोच्च न्यायालय के भी संकट हो जाते हैं।
3) न्यायिक पुनर्विलोकन के बारे में आप क्या जानते हैं? न्यायपालिका की स्वतंत्रता को आप कैसे संरक्षित कर सकते हैं
उतर:- ( judicial Review ) न्यायिक पूर्व अवलोकन को न्यायपालिका की ऐसी की ऐसी शक्ति के रूप में समझा जा सकता है जिसके द्वारा वह व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्य की संवैधानिकता और वैधता का परीक्षण कर सकती है। संविधान के प्रावधानों और कानून के माने सिद्धांतों के विपरीत होने पर ऐसे कार्य को अवैध और सुनने घोषित कर सकती है तथा निरस्त कर सकती है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित तकनीक को अपनाया जा सकता है :-
१) न्यायाधीशों की नियुक्ति का तरीका नजीसन की नियुक्ति के संबंध में प्राय तीन तरीके अपनाए जाते हैं जो निम्नलिखित है:-
A) सर्वसाधारण द्वारा निर्वाचन शक्तिपुत्र कारण के सिद्धांत से प्रभावित होकर प्रांत द्वारा यह पद्धति अपनाई गई थी स्विट्जरलैंड की कुछ कांटों में तथा अमेरिका संघ के कुछ राज्य में भी न्यायाधीशों के जनता द्वारा निर्वाचित होने की पद्धति प्रचलित है इस पद्धति के विपक्ष में यह कहा जाता है कि इसके अंतर्गत न्यायाधीशों की नियुक्ति योग्यता को कुशलता के आधार पर न होकर राजनीतिक आधार पर होती है सब साधारण को न्यायाधीशों की योग्यताओं अपने की क्षमता नहीं होती इसलिए अयोग्य व्यक्ति न्यायाधीश बन जाते हैं डॉक्टर गार्डनर के अनुसार --"न्यायाधीश के निर्वाचन से न्यायपालिका का चरित्र गिर जाता है न्यायाधीश राजनीतिक बन जाते हैं उनके नायक मस्तिक पर ऐसा कुप्रभाव पड़ता है कि अपने आप को उसे बचा नहीं सकते "
B)व्यवस्थापिका द्वारा निर्वाचन:- सोवियत रूस स्विट्जरलैंड वॉलीबॉल कोस्टा रिका हे वास लाविया आदि देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति निर्वाचन के द्वारा वहां की व्यवस्थापिकाऐ करती है।
C) कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति:- विश्व के अधिकांश देशों में न्यायाधीशों की नीति कार्यपालिका द्वारा की जाती है इस पद्धति में कार्यपालिका द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावना रहती है उत्तर प्रदेश देश में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए या तो संविधान में व्यवस्था की जाती है या कुछ नियम निर्धारित किए जाते हैं।
2)सुनिश्चित एवं सुरक्षित कार्यकाल:- जहां तक संभव होना है जिससे की नियुक्त पर्याप्त कल के लिए की जानी चाहिए जिससे से उनके भ्रष्ट या पचपति होने की संभावना कब हो जाती है इसे उनकी स्वतंत्रता निर्भीकता एवं कार्य कुशलता में वृद्धि होगी
3)समुचित एवं पर्याप्त वेतन :-न्यायाधीशों को स्वतंत्र और निष्पक्ष बने रहने के लिए आवश्यक है कि उन्हें पर्याप्त वेतन दिया जाए क्योंकि अपर्याप्त वेतन मिलने पर भी अप भ्रष्टाचार का शिकार हो सकते हैं सेवानिवृत होने पर उन्हें पेंशन की भी सुविधा मिलनी चाहिए इसके अतिरिक्त व्यवस्था भी होनी चाहिए कि न्यायाधीशों की पद अवधि में उनके वेतन में लाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सके
4)अपदस्थ की विशिष्ट विधि"- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए की आवश्यक है कि न्यायाधीशों की पद मुक्ति व्यवस्थापिका या कार्यपालिका के द्वारा सामान्य विधि से न होकर विशिष्ट विधि अर्थात महाभियोग के द्वारा ही की जाए विशिष्ट विधि अपनाया जाने पर कार्यपालिका या व्यवस्थापिका न्यायाधीशों पर अनुचित दबाव नहीं डाल सके कि इससे न्यायाधीश स्वतंत्रता पूर्वक अपने कार्य करते रह सकेंगे
5)कार्यपालिका से स्वतंत्रता:- न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं निष्पतन के लिए आवश्यक है कि उसे कार्यपालिका से अलग रखा जाए कानूनी की व्याख्या का अधिकार सर्वदा व्यक्तियों की उसे निकाय के हाथों में होना चाहिए जो कार्यपालिका की इच्छा से बात देना हो एक ही व्यक्ति या सक्ता अभियुक्त और साथी साथ न्यायाधीश हो तो स्वतंत्र न्याय की आशा नहीं की जा सकती।
4) उपभोक्ता न्यायालय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। उतर:- उपभोक्ता न्यायालय उपभोक्ताओं के हित के संरक्षण हेतु तथा उपभोक्ता विवादों के निपटारे हेतु 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को पारित किया गया ।यह अधिनियम 1 जुलाई 1987 से जम्मू कश्मीर राज्य को छोड़कर समस्त भारत में लागू किया गया। उक्त अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ताओं के विवादों को हल करने के उद्देश्य से जिला स्तर पर जिला फोरम राज्य स्तर पर राज्य आयोग तथा राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र आयोग के रूप में उपभोक्ता आधारितों की स्थापना की गई।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1993 के द्वारा 1986 के अधिनियम में व्याप्त कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया था तथा उपभोक्ता अदालत की कार्य क्षेत्र एवं अधिकार क्षेत्र को अधिक विस्तृत किया गया 2002 इसी में पारित उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम द्वारा विगत के वर्षों में आई हुई संगतियों को दूर करने का प्रयास किया गया तथा प्रावधानों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया उपभोक्ता अदालत को महत्व को देखते हुए उपभोक्ता में छाती को पूर्ति प्राप्त करने के उद्देश्य विभिन्न आयोग का आशय देना शुरू किया परिणामताः आयोग के कार्य में विसंगतियां आ गई इसे दूर करने के लिए ही 2002 के अधिनियम के द्वारा प्रावधानों में व्यापक बदलाव किए गए।
उपभोक्ता अदालत की शक्तियां:- जिला फोरम राज्य आयोग राष्ट्रीय आयोग पर क्षेत्र के विस्तृत के आधार पर शक्तियां प्राप्त है जिला फॉर्म प्रतिवादी या साक्षी के संबंध जारी करती है साथियों के परीक्षा करती है तथा दस्तावेज की जांच करती है तथा उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने का प्रयास करती है जिला फॉर्म के समक्ष हुई कार्यवाही नायिका नायक कार्रवाई मानी जाती है यह एक दीवानी अदालत के रूप में कार्य करती है वैसे जिला फॉर्म के फैसले के विरुद्ध राज्य आयोग तथा राज्य आयोग के फैसले के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है यदि कोई पांच राष्ट्रीय आयोग के निर्णय से भी असंतुष्ट ना हो तो 30 दिन के अंदर उच्चतम न्यायालय के समाज अपील कर सकती है
उपभोक्ता अदालत का महत्व:- उपभोक्ता अदालत उपभोक्ताओं के हित की रक्षा करता है तथा उन्हें उचित न्याय प्रदान करता है यह अदालत उपभोक्ताओं के नुकसान की भरपाई करवाते हैं तथा विक्रताओं एवं कंपनियों से उन्हें क्षतिपूर्ति दिलवाते हैं जिला फोरम में 20 लाख तक के विवादों से संबंधित शिकायतों का समाधान किया जाता है राज्य आयोग में 20 लाख से लेकर 1 करोड़ तक के मूल्य के विवादों का निपटारा किया जाता है इसके ऊपर के विवादों का शिकायत तथा समाधान राष्ट्रीय आयोग में होता है उपभोक्ता अदालत के भाई से विक्रेता किसी भी रूप में देवताओं के धोखा नहीं देता और यदि ऐसा होता है या करता है तो उन्हें कामयाब करना पड़ता है उपभोक्ता अदालत इस बात का विचार रखता है कि कोई क्रेता विक्रेता को भी धोखा देने की कोशिश करता है तो उसे पर भी जुर्माना लगाया जाता है उपभोक्ता अदालत के संबंधों को बिगड़ने से बचाता है और बिगड़ी संबंधों को सुलझाता है ।
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