*शास्त्रीय अनुबंधन अनुक्रिया व्यवहार संबंधी अधिगम में सहायक सिद्ध होती है जबकि सक्रिय अनुबंध सक्रिय व्यवहार संबंधी अधिगम में सहायक है।
*शास्त्रीय अनुबंधन में उद्दीपकों की केंद्रीय भूमिका होती है इसलिए इसे उद्दीपन जन्य अनुबंधन भी कहते हैं जबकि सक्रिय अनुबंधन से प्रतिक्रिया केंद्रीय भूमिका में रहती है इसलिए इस प्रतिक्रिया जन्य अनुबंधन(R-types condition) भी कहते हैं।
* शास्त्रीय अनुबंधन में अनुबंध की शक्ति अनुबंध प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है जैसे पौलव के प्रयोग में कुत्ते के मुंह से निकल लार की मात्रा से अनुबंध की शक्ति का पता चलता है जबकि चक्र अनुबंध में प्रतिक्रिया द्वारा अनुबंध की शक्ति का पता चलता है जैसे स्किनर के प्रयोग में लिवर दबाने की क्रिया के अनुपात कार्य के चित्र मिल सके इसकी व्यवस्था की गई है।
* शास्त्रीय अनुबंधन का आरंभ किसी विशेष उद्दीपक द्वारा एक निश्चित प्रतिक्रिया से होता है जबकि चक्र अनुबंध में सीखने वाला स्वाभाविक प्रतिक्रिया करता है।
* शास्त्रीय अनुबंधन में सीखने वाला वैसा ही व्यवहार करता है जैसा दीपक उसके सामने हो जबकि सकरी अनुबंध में सीखने वाला प्रतिक्रिया के लिए काफी हद तक स्वतंत्र होता है।
* शास्त्रीय अनुबंधन में परिणाम की प्राप्ति के लिए किसी ज्ञात उद्दीपक का होना आवश्यक है जबकि सक्रिय अनुबंधन में किसी ज्ञात उदिद्पक की आवश्यकता नहीं होती।
* शास्त्री अनुबंध में पुनर्वर्धन रिइंफोर्समेंट का प्रयोग सीखने वाले के प्रतिक्रिया से पहले किया जाता है जबकि शुक्रिया अनुबंधन का आरंभ प्रतिक्रिया से होता है बाद में पुनर्बलन का प्रयोग किया जाता है।
* शास्त्र अनुबंध में प्राणी आचरण करने से पहले ही उद्दीपक से परिचित होकर उसी से आचरण की प्रेरणा ग्रहण करता है जबकि सक्रिय अनुमंडन में प्राणी आचरण से पश्चात उद्दीपक से परिचित होता है इस प्रकार के अनुबंध में आचरण को प्रेरित करने के लिए कोई दूसरी शक्ति कार्य करती है।
* शास्त्री अनुबंध में आराम में अनुवर्ती क्रिया की शक्ति सुनने होती है अर्थात घंटी की ध्वनि से कुत्ते में लड़ नहीं टपकती जब कीचक या निबंध का स्वयं प्राणी में ही प्रतिक्रिया की शक्ति होती है उदिद्पक के प्रभाव से उसकी शक्ति में वृद्धि मंत्र देखने को मिलती है।
* शास्त्री अनुबंध एक यांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति के गुना को कोई महत्व नहीं दिया गया इसमें व्यक्ति की रुचि प्रेरणा शारीरिक अवस्था मानसिक स्थिति आदि की अपेक्षा की गई है जबकि सक्रिय अनुबंधन द्वारा व्यक्ति अपने परिवर्तनशील प्रवेश में सीखने की क्रिया के साथ ही अपनी अवस्थाओं की पूर्ति भी कर सकता है।
2) अंतर्दृष्टि शिक्षण की प्रमुख विशेषताएं क्या है ?इस शिक्षण का शिक्षा में क्या महत्व है?
--- अंतर्दृष्टि या सूक्त शिक्षण की प्रमुख विशेषताएं:- सामानीकरण और पृथक्करण:- समग्रता वादी मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि उत्पन्न करने के लिए कोहलर मानसिक प्रक्रिया पर अधिक जोर देते हैं।
क)समानीकरण :-समस्या के समाधान में सामान्य विशेषता वाले तत्वों को केंद्रित कर सामानधर्मी सिद्धांत तैयार करना ही सामान्य कारण कहलाता है।
ख) पृथक्करण :-शिक्षण की परिस्थिति में प्रासंगिक तत्वों का निषेध कर केवल परियोजनीय तत्व तथा सामान्य विशेषता वाले तत्वों का चयन ही पृथक्करण कहलाता है
2) व्यक्तिगत विशेष्ता :-शिक्षक के क्षेत्र में किसी कार्य को करने से पहले बाधा उत्पन्न होने पर शिक्षार्थी में एक जॉब की स्थिति उत्पन्न होती है तब वह अपने असफलता को दूर करने के लिए स्थिति का संपूर्णता से विश्लेषण करता है और उसमें अवांछित तत्वों के बाद उपयुक्त गुना का चयन करता है जिसे उसके सामने पूरे समस्या का सही समाधान प्रस्तुत हो जाता है।
3) समस्याओं का विश्लेषण तथा समाधान:- समग्रता वादी के अनुसार अंतर दृष्टि शिक्षक के कई स्तर है जैसे शिक्षक स्थिति या समस्या को समग्र रूप में प्रस्तुत करना ना कि उसके अंश की प्रस्तुति करना नंबर का आशिक स्थिति की वजह पूरी समस्या को समग्र रूप में प्रस्तुत करना परिस्थितियों के विभिन्न अंशु के बीच संबंध स्थापित करना समस्या के अंतर नहीं तत्व तथा विशेषताओं की पृथ्वी कारण और सामान्य करण की प्रक्रिया अंत में अपने व्यवहार में आकास्मिक में परिवर्तन द्वारा समस्या का समाधान।
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